भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 191

१८० उपसंहारिणी टिप्पणी । {|c|} \hline पृथ्वोराजजी, समरसीजो और पृथाबाईजी के खास रुक्के पट्टे परवाने आदि \hline भेंट करने तथा उनकी सत्यता की परीक्षा करने के लिये हमारे स्वदेशी परम प्रसिद्ध विद्वान मित्र राय बहादुर डाक्तर राजा श्रीराजेन्द्रलालजी मित्र ऐल० ऐल० डी०, सी० आई० ई० की सेवा में भेजे हैं । उक्त डाक्तर साहब अकस्मात् रोगग्रस्त हो गये कि जिससे यह हमारे बड़े परिश्रम से शोध किये हुवे लेख उक्त विद्वत् मंडली में प्रवेश नहीं हो सके हैं किन्तु हम को आशा है कि राजा साहब के नैस्थ्य होते ही उक्त लेख सोसार्टी में प्रवेश होकर यह विषय विद्वत् मंडली में छिडेगा । यह विषय अभी हमारा सौंपा हुवा एक महान पुरातत्ववेत्ता विद्वान के हात में है अतएव हम उन लेखों की प्रतियें तथा अपने निज विचारों को प्रकाश नहीं कर सक्ते परंतु इतना तो निःसंदेह कह सक्ते हैं कि अभी तक हम उनको अकृत्रिम समझते हैं और ऐसा समझने को सतर्क सिद्ध भी कर सक्ते हैं । इसके साथ हमको इस कहने में कुछ भी लज्जा नहीं है कि यदि उक्त डाक्तर मित्र, हमारे विद्या-गुरु डाक्तर होर्नली साहब, मिस्टर याऊज साहब और मिस्टर ग्रियरसन साहब, जैसे पक्षपात रहित और सहसा सिद्धान्त न करने वाले पुरातत्ववेत्ता विद्वान उनको अप्रमाणिक सिद्ध कर ग्रहण करेंगे तो हम भी उन्ही से सम्मत होंगे क्योंकि हमको किसी बात का वास्तव में दुराग्रह नहीं है बरुक्त इसमें भी कुछ संदेह नहीं है कि जो कोई अन्य मनुष्य बिना किसी योग्य कारण के हमारे स्वदेश और उसकी विद्या पुस्तकों को दोष दे तो हम उस दशा में उन के एक बड़े कट्टर पक्षकार हैं ॥ अंत में हमारा सब विद्वानों से यही सविनय निवेदन है कि इस महाकाव्य को उस की भले प्रकार परीक्षा कर के पढ़ें और पढावें और जो कहीं उस में कुछ हमारा कहना तथा कोई अनुमानादि का करना अयोग्य प्रतीत हो तो हम को क्षमा करें । यही प्रार्थना हम विशेष कर {|c|} \hline समाप्ति \hline के हमारे मित्र महामहोपाध्याय कविराज श्रीश्यामलदासजी की सेवा में भी करते हैं क्योंकि उनके विचारों और अनुमानों का हमने विशेष कर के एक बलिष्ट भाषा में खंडन कर हमारे स्वदेशाभिमान और उसकी हिन्दी विद्या की संरक्षा कियी है । इस के साथ यह भी वक्तव्य है कि जैसे हम ने इस उपसंहारिणी टिप्पण में इस महाकाव्य के पांच चार विषयों के विषय में अपने विचार प्रकाश किये हैं वैसेही चंद के व्या- करणादि जैसे शेष विषयों के विषय में भी हम यथावकाश लिखेंगे इत्यलम् ॥ मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या ।