भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 470 में से

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पृष्ठ 190

उपसंहारिणी टिप्पण । १७६ गया है उस से प्रश्नकर्त्ता की प्रतिज्ञा हानि और हेत्वाभास स्वयम् सिद्ध हैं । हमने इस विषय में हमारी लिखी पृथ्वीराज रासे की सारता की अंग्रेजी पुस्तक के पृष्ठ १५ और ३७ लेखखंड ११ और २८ और हिन्दी की के पृष्ठ १८ और ३६ और लेखखंड ११ और २८ में बहुत कुछ लिख कर प्रकाश किया है। क्या जितना अंश इस महाकाव्य का मुसलमानी तवारीखों से मिलता हुआ है वह उसके बनाने वाले ने उन तवारीखों को सोलहवीं सदी में पढ कर यह जाल निर्माण किया है? क्या उस समय की हसन निजामी की तवारीख, तबक़ात नासरी, और अबुलफ़िदा, आदि नामक तवारीखों में परस्पर कोई ऐसे विरोध नहीं हैं और क्या वे एक दूसरे से सर्व प्रकार से परम सम्मत हैं? कविराजजी ने स्वयम् यह स्वीकार किया है कि तब- क़ात नासरी ने मनुष्यों के अशुद्ध नाम लिखे हैं और अबुलफ़िदा ने संवत ही नहीं लिखे हैं फिर उनके दोषों से यह महाकाव्य क्योंकर दूषित हो सक्ता है? क्या उक्त मुसलमानी तवारीखों के कर्त्ताओं ने सब वृत्त यथातथ्य लिख कर केवल सत्य ही लिखने और मिथ्या कुछ भी न लिखने का एक भंडा हाथ में लिया है? देखो क्या यह शोक की बात नहीं है कि तबक़ात नासरी का ग्रंथकर्त्ता विचारा स्वयम् कहता है कि जिस वर्ष में पृथ्वीराजजी की अंतिम लड़ाई हुई थी उसमें तौ वह उत्पन्न हुआ था और उसके ३५ वर्ष पीछे वह पहिले ही पहिल हिन्द में आया था, उस ने जो कुछ इस विषय में लिखा है वह उसने एक मनुष्य से सुनकर लिखा है, फिर हम नहीं जानते कि कविराजजी मिनहाज-इ-सिराज जैसे एक भले आदमी को क्यों प्रत्यक्ष प्रमाण की साक्षी में घेरते हैं। हम पृथ्वीराजरासे और उस समय की सब मुसलमानी तवारीखों को एक दृष्टि से देखकर यह कहते हैं कि जिस २ ग्रन्थकर्त्ता ने जो, जितना, और जैसा, देखा और सुना, वह उसने अपनी इच्छा और शैली के अनुसार लिखा है; यदि उन में से किसी की कोई बात हमको अयथार्थ प्रतीत और सिद्ध हो तौ हम उसको अस्वीकार कर. सक्ते हैं, किन्तु हम उनमें से किसी को भी लोर्ड हेस्टिङ्गस के समय में जैसे नन्दकुमार को जाल के अपराध में फांसी की शिक्षा दियी गई है वैसी शिक्षा विद्वानों के हाथ से कदापि नहीं दिलाना चाहते हैं। निदान हम फिर भी प्रसन्नता और विचार पूर्व्वक कह सक्ते हैं कि प्रत्येक ग्रन्थकर्त्ता ने अपने २ ज्ञान के अनुसार ऐतिहासिक वृत्त लिखे हैं चाहे उसमें कोई बात असत्य भी क्यों न हो परन्तु उस असत्य बात के कारण से आदि से अंत पर्यंत कोई ग्रन्थ जाली नहीं हो सक्ता । इस बात के मान लेने में हमको कोई लज्जित होने की भी बात नहीं है कि यह पृथ्वीराज रासा चंद का लिखा हुआ सच्चा है, उसके दो एक समय उसके बड़े बेटे जल्ह के लिखे हुवे हैं और उसमें जो कहीं २ कुछ क्षेपक अंश पीछे से किसी ने मिलाया होगा वह विद्वानों के परीक्षा करने से स्वयम् तरजावेगा। अब तौ कोई बात अड़चल की रही ही नहीं है क्योंकि यह आदि पर्व्व तौ हमने यथाशक्ति संशोधित करके हमारे पाठकों की सेवा में अर्पण कर ही दिया है, कि उसी से हम इस महाकाव्य की अकृत्रिमता की परीक्षा करना प्रारंभ कर सक्ते हैं और प्रति मास में हम यह भी सिद्धान्तकर सक्ते हैं कि यहां तक तौ कुछ जाली अंश है अथवा नहीं । इस बात के जानने से हमारे पाठकों को बहुत प्रसन्नता होगी कि हमको शोध करने से पृथ्वीराजजी और रावलजी श्रीसमरसीजी और महाराणी श्रीपृथाबाईजी के थोडे से खास रुक्के और पट्टे परवाने प्राप्त हुवे हैं कि जिन में वही आनन्द विक्रमी संवत् है कि जो पृथ्वीराज रासे में लिखा हुआ मिलता है । इन सब के फोटोग्राफ हमने एशियाटिक सोसाईटी बंगाल को

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