पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 189, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें१७८ उपसंहारिणी टिप्पण । है । रासे की सं० १६३१ । ३२ और १६४५ की लिखित पुस्तकें हमारे पास विद्यमान हैं । तथा अकबर बादशाह ने पृथ्वीराज रासे की कथा अपने दरबारी भाट गंगजी से सं० १६२७ । २८ में सुनी थी कि जिस के वृत्तान्त की एक सं० १६२९ की लिखी हुई चंद छंद वर्णन की महिमा नामक पुस्तक हमको प्राप्त हो चुकी है और उसी के साथ जो समय स० १६४० से १६९० तक का रासे के जाली बनने का अनुमान किया गया है उस समय में मेवाड़ में एक राणारासा नामक ग्रंथ राव दयाल कवि ने बनाया है कि जिस को भी हमने शोध काढ़ा है । इस राणारासे की पुस्तक सं० १६७५ की लिखी हुई से हम ने हमारे पुस्तकालय के लिये एक प्रति करवाई है और हमारी प्रति से बहुत से अन्य भद्रपुरुष प्रतियें करवाते हैं । खैर यह सब बातें तो जाने दीजिये और एक इस छोटी सी बात पर ही ध्यान दीजिए कि रासे की उन सब पुस्तकों के अंत में कि जो मेवाड़ राज की एक पुस्तक से प्रति हुई हैं मूल पुस्तक के लिखने वाले लेखक के लिखे हुए नीचे लिखे छंद प्राप्त होते हैं कि जिन में यत्किंचित वृत्त लिखा हुआ है । यह छंद हम आशा करते हैं कि उन पुस्तकों में भी अवश्य होंगे कि जो एशियाटिक सोसाईटी बंगाल के पुस्तकालय में हैं :- कवित्त ॥ मिलि पंकज गन उदधि । करद कागद कातरनी ॥ कोटि कवी काजलह । कमल कटिकतैं करनी ॥ हितिथि संख्या गुनित । कहै कक्का कवियांने ॥ दृह श्रम लेपन हार । भेद भेदै सोइ जाने ॥ दून कष्ट ग्रन्थ पूरन करय । जन सभ्या दुप नां लहय ॥ पालिये जतन पुस्तक पवित्र । लिपि लेपक बिनती करय ॥ १ ॥ गुन मनियन रस पोइ । चंद कवियन कर दिट्ठिय ॥ छंद गुनीतें तुट्टि । मंद कवि भिन भिन किट्ठिय ॥ देस देस विष्परिय । मेल गुन पार न पावय ॥ उद्दिम करि मेल वत्त । आस बिन अलस आवय ॥ चित्रकूट रान अमरैस नृप । हित श्रीमुप आयस दयौ ॥ गुन बीन बीन कहना उदधि । लपि रासो उद्दिम कियौ ॥ २ ॥ दोहा ॥ लघु दीरघ ओको अधिक । जो कछु अंतर होइ ॥ सो कवियन मुष सुद्धतैं । कहो आप बुधि सोइ ॥ ३ ॥ इन छंदों से यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि किसी कक्का नामक पुरुष ने मेवाड़राज्य के अधीश बड़े श्री अमरसिंहजी (चित्रकोट रान अमरैस नृप) के आज्ञानुसार राज के पुस्तकालय के लिये उक्त पुस्तक लिखी थी । इन महाराणाजी का राज्य समय कविराजजी के मानने के अनु- सार सं० १६५३ से १६७६ तक का है । जब कि मेवाड़ राज की पुस्तक का उसकी अन्य प्रतियों से सं० १६५३ से १६७६ के बीच में लिखा जाना अनुमान होता है तो फिर इस समय में जाल बनना भला कोई कैसे मान सक्ता है । अब रहा संवत १६७१ की भविष्य बातों का विदित करने वाला दोहा उसके विषय में हमने हमारी संरक्षा के लेखखंड २७ पृष्ठ ३५ में सविस्तर कह दिया है अतएव यहां कुछ अधिक नहीं वर्णन करते हैं ॥ ४ यद्यपि इस महाकाव्य के जाली बनने के अनुमान का प्रश्न तो रीति से किया गया है कि "इस ग्रन्थ में लिखे पृथ्वीराजजी के समय के मनुष्यों के नाम और वृत्त उस समय की मुसलमानी तवारीखो में लिखे हुओं से नहीं मिलते हैं परन्तु जिस प्रकार से उस प्रश्न का निर्णय किया