पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपसंहारिणी टिप्पणी । १७७ दृट्टियो सिंघ बरदाइ देपि । बोलंत विरद बहु बिधि विसेपि ॥ चीतोर राज कारम्म कौन । पुम्मान पाट पग अचल दीन ॥ मेर गिरि सरिस चित्तौर मानि । किरनाल तेज बढ्ढे पुमान ॥ जैचंद समह जिन जुद्ध कीन । मानों कि उरग जनु मौर पीन ॥ कलंकिया राय केदार राय । कवदेत विरद मनउमँग चाय ॥ पापी राय प्राग वड समान । कृषन दरिद्र करतार जान ॥ हित्यार राइ कासी अभंग । मद्रुआंन राइ गंगा उतंग ॥ सुरतान मलन बंधन समोप । हिंदूक राइ टालच दोप ॥ उज्जैन राइ बंधन समत्थ । आचार राइ जुज्वरह पथ्थ ॥ भीमंगराइ भंजन सुपेत । जस लयो धवल रानिंद जेत ॥ रिनथंभ राय सिर दंड कीन । अव्वुन्ना राइ गढ लेइ दीन ॥ उय्याप राइ छापन समत्थ । सोपन सरीर प्रथिराज सत्थ ॥ दप्यनी साह भंजन अलग । चंदेरि लिहु किय नाम जग ॥ ४१ ॥ हमारे पाठकों को इस रूपक का तात्पर्य निकालने के पहिले यह जान लेना अत्यावश्यक है कि वह रासे के समरसी दिल्ली सहाय नामक समय में का है। रासे की किसी पुस्तक में तो यह समय पृथक है और किसी में वह बड़ी लड़ाई नामक समय के आदि में ही मिला हुआ है। इस रूपक के अन्तर्गत वृत्त का प्रसंग यह है कि रावल समरसीजी अपनी महाराणीजी श्री पृथा- बाईजी सहित अपने साले पृथ्वीराजजी की सहायता करने को चीतोड़ से दिल्ली पहुंचे और वहां उन का आदर सम्मान वहां के सब राज-पुरुषों ने करना प्रारंभ किया कि उसी प्रसंग में महाकवि चंद बरदाई ने भी वैसे ही रावलजी को आशीष दियो कि जैसे वर्तमान काल में प्रत्येक देशी राजस्थानों में चारण और राव आदि स्तुति पाठक दिया करते हैं । रावलजी श्रीसमरसीजी में जो २ मुख्य गुण थे और उनों ने जो २ बड़े २ काम अर्थात् शौर्य किये थे उन सब को उन की प्रशंसा में कवि चंद ने प्रयोग कर के यह बिरदावली कही है । अब इस में यह बात विचारने की है कि कविराजजी ने जो इस रूपक में के-“कलंकिया राय केदार”-जैसे विशेषणों का महाराणाजी श्रीसंग्रामसिंहजी (सांगा) की ओर संकेत होना अनुमान करके रासे के जाली बनने के समय के प्रारंभ का सं० १६४० निश्चय किया है वह इस मूल रूपक के अवलोकन करने से सत्य मालूम होता है कि नहीं । यदि हम कविराजजी के अनुमान को यथार्थ होना भी मान लें परन्तु इस रूपक में-“कलंकिया राव केदार”-आदिकों के साथ ही-“जैचंद समह जिन जुद्ध कीन-” और-“सोंपन सरीर प्रथिराज सत्थ” जैसे स्पष्ट विशेषणों के वाक्यखंडों को हम महाराणा जी श्रीसांगाजी में कैसे घटा सकते हैं । क्या यह बात विद्वानों के कहने की है कि-“जैचंद समह जिन जुद्ध कीन”-और-“सोंपन सरीर प्रथिराज सत्थ”-जैसे स्पष्ट विशेषणों को छोड़ देना-और- “कलंकिया राय केदार”-आदिक को सांगाजी पर घटा कर केवल उन ही तुकों को क्षेपक बताईं होतीं तो भी यह एक प्रकार से कुछ ध्यान में बैठने जैसी बांतें होतीं । हम यह भी नहीं समझ सक्तें हैं कि इस रूपक से सं० १६४० कैसे सिद्ध होता है क्योंकि महाराणाजी श्रीसांगाजी का राज्य समय कविराजजी के मानने के अनुसार सं० १५६५ से सं० १५८४ तक ही और संवत् १६४० का वर्ष महाराणाजी श्री बड़े प्रतापसिंहजी के राज्य समय सं० १६५३ से १६५४ तक के में आता १९२