पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९७६ उपसंहारिणी टिप्पण । १ इस महाकाव्य में संवत् लिखे हुवे हैं वह मुसलमानी तवारीखों में लिखे और संवत शोध हुवे संवतों से नहीं मिलते और उन में ९० वा ९१ वर्ष का अन्तर पड़ता है अतएव इस बात का निर्णय करने को हमारी टिप्पण १६८ और ३५५ । ५६ वादी पढ़ें कि उनके पढ़ने और पक्षपात रहित मनन करने से हम आशा करते हैं कि वादी की संवत् के अंतर विषयिक शंका निवारण हो जायगी ॥ २ इस ग्रंथ में मुसलमानी भाषादि के शब्द प्रयोग हुवे दृष्टि आते हैं उनके विषय का समाधान हमारी इसी उपसंहारिणी टिप्पण का भाषा संबन्धी चौथा लेख खंड अवलोकन करने से भले प्रकार हो सक्ता है ॥ ३ अब तक पृथ्वीराजजी के समकालीनों में से केवल रावल समरसीजो को ही आक्षेप करने वाले ने उदाहरण में ग्रहण किये हैं कि उसके विषय में केवल आबू और चीतोड़ की पांच चार प्रशस्तियों से ही संशय-करने वाले को संशय होता है अर्थात् संशय का आधार उन ही प्रशस्तियों पर है। यदि उन प्रशस्तियों के संवतों को विद्वान लोग भले प्रकार परीक्षा कर के यह निश्चय कर लें कि वे रावल समरसी जी के ही समय की हैं और उनके संवत् अमुक प्रकार के हैं और इसको पृथ्वीराजजी समरसीजी और पृथाबाईजी के जो पखाने प्राप्त हुवे हैं उन के संवतों को भी उसी प्रकार जांच देखें तो फिर रावल समरसीजी के समकालीन होने में कुछ झगड़ा ही न रहेगा क्योंकि झगड़ा तभी तक रहता है कि जब तक किसी विद्वान को किसी प्रकार का पक्षपात होता है और वह दर्पण लेकर मुख दिखते हुवे भी नहीं दूर होता है। जहां तक हमने रावल समरसीजी के विषय में शोध किया है वहां तक हमको इस बात में कुछ संदेह नहीं है कि वे पृथ्वीराजजी के बहनेऊ और समकालीन थे। आबू और चीतोड की प्रशस्तियों के संवतों को समझ लेने के लिये एक रोज की बात हमने हमारी टिप्पण ३५५ । ५६ में अति संक्षिप्त रूप से कही है। इस के अतिरिक्त हम एक बड़ी अद्भुत अपूर्व बात पर विद्वानों को ध्यान दिलाते हैं कि कविराजजी ने इस महाकाव्य के संवत् १६४० से १६७७ के भीतर जाली बनने के सिद्ध करने में नीचे लिखे प्रमाण कहा है :- “इस किताब में मेवाड़ के राजाओं की बहुत सी प्रशंसा रावल समरसिंहजी के नाम से की है और एक स्थान में उनको आशिंस देने में यह शब्द लिखे हैं- (१) कंलकियां राय केदार ॥ (२) पापियां राय प्रयाग ॥ (३) हत्यारां राय वणारसी ॥ (४) मदवान राय राजान री मंग ॥ (५) सुलतान यहण मोरखन ॥ (६) सुलतान मान मलन ॥ इन पदवीयों से मेवाड़ के महाराणा संग्रामसिंहजी (सांगा) की ओर संकेत है”—इत्यादि ॥ अब विद्वानों को रासे के उस रूपक को अवलोकन कर के परीक्षा कर समझना चाहिये कि जिस में से यह वाक्यखंड उद्धृत किये गये हैं, वह रूपक नीचे लिखे प्रमाण हैं :- छंद पद्धरी ॥ सामंत सब्ब मनुहार कीन । प्रोहित्त राम आसीस दीन ॥ हरि सिंहि दिदु वरदान भट्ट । उच्छल्यो चंद पैपै सु घट्ट ॥ हुहु पष्ष चँवर सिर धरिय छत्र । वरदाइ दंत आसी तत्र ॥