पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपसंहारिणी टिप्पण । १७५ ॥ गोस्वामी श्री लक्ष्मीनाथजी परमहंस कृत पदावली ॥ नमो नमो गीता हरि वंशं । सुर नर मुनि सज्जन अवतंसं ॥ कोमल पद उपनिष श्रुति अंगं । हरि मुख कथित सन्त हिय हंसं ॥ विमल श्याम भाषित गन संगं । देव दनुज मानव अघि घंसं ॥ भक्ति विराग ज्ञान परगाशं । काम क्रोध मद मोह विनाशं ॥ सकल शास्त्र सम्मत निति शोशं । आर्य धर्म सुत्र दायक हंस ॥ श्रुति सागर तीरथ फल देशं । कलि मल तिमिर प्रकास दिनेशं ॥ गुण अनन्त कहि गावत शेषं । चतुरानन गण देव महेशं ॥ सुनत सकल मन होत हुलाशं । लक्ष्मीपति अति पाप विनाशं ॥ १ ॥ ॥ नरहरदास कृत अवतार चरित्र ॥ भुजंगी ॥ सुगन्धं विगन्धं न अस्तुति गारी । विभेदं न सत्रुं न मित्रं विचारी ॥ न मंहिमा न माया न मूढं न मोहं । न रंगं विरंगं न दावा न द्रोहं ॥ न सीतं न तापं न संगं कुसंगं । न भावं न भिष्यान अंगं अनंगं ॥ मुखं भूमि सज्या न हासं न वासं । यहै बाहैं आनै ततौ पंच यासं ॥ सम विष्वहं भूमि पंथ सहज्ज । बसंतं दिगं बीत रागं विलज्जं ॥ विमोहं विदेहं न इन्द्री विकारं । अघानैं रहे नित्ति वातं अहार ॥ विलेपं न ओपंऽ आगो विचार । धरी पुष्प माला गलै बिष्य धारं ॥ प्रकासी जु निंदा महा मोद पावै । हसे ताल दे आप औरै हसावे ॥ अलेपं अकेले रहे अप्रकासं । निरा पेत निर्बंध नग्नं निरासं ॥ अनाजूत अवधूत माया अतीतं । अमोहं अछोहं अद्रोहं अभोतं ॥ अनाम अकामं अठामं अजेयं । अनाधार आकार महिमा अमय ॥ पशु वृत्ति लीने भषै पान पानी । विचारं प्रचारं विहारं बिमानी ॥ यह महाकाव्य आज तक महाकवि चंद का बारहवीं शताब्दी का रचा हुआ एक बड़ा प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथ कर के हमारे स्वदेश में प्राचीन काल से चला आता है अकृत्रिमता और उसकी यथार्थता में आज तक क्या तो स्वदेशी और क्या किसी विदेशी विद्वान को कोई ऐसी शंका नहीं हुई है कि जैसी हमारे परम प्रिय मित्र महामहोपाध्याय कविराजजी श्री श्यामलदासजी को बैठे बैठाये हो गई है । यद्यपि हम इस महाकाव्य को अभी तक अनुकूल दृष्टि से ही देखते हैं किन्तु उसी के साथ हम उसकी परीक्षा करने में प्रतिकूल दृष्टि देकर उसके गुण-दोषों को भी देखते जाते हैं और जब हमको उस में कोई दोष देने जैसी बात नहीं मिलती तब उसी स्थान पर हम अपनी टिप्पण में अपना अभिप्राय लिख प्रकाश करते हैं। हमारे पाठकों को यह भले प्रकार समझ रखना चाहिये कि जिस दिन जिस स्थान में जो कुछ हम को क्रित्रिम दीखेगा उसे हम उतने ही बल पूर्वक दोष देकर प्रकाश कर देंगे कि जैसे हम उसके गुणों को प्रकाश करते हैं और जो कोई बात हमको उस में दोष देने जैसी मिलेगी ही नहीं तो फिर हम अशक्त हैं। इस महाकाव्य की क्रित्रिम अनुमान करने में जितने हेतु दिये गये हैं उन में से प्रत्येक के विषय में हम निम्न लिखित कुछ निवेदन करते हैं:-