पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७४ उपसंहारिणी टिप्पणी । ॥ चूरनवाले ॥ है चूरन खट्टा चूक । जिस सें नित्त लगेगी भूक ॥ ५ हम अनुस्वार सहित शब्दों के प्रयोग के विषय में जो ऊपर कह आये हैं उस के नीचे लिखे उदाहरणों को अवलोकन करने से आशा है कि हमारे पाठकों को पूर्ण संतोप हो जावेगाः- ॥ सूरसागर ॥ राग भैरवी ॥ भजि श्री विट्ठल चरण सरोजं । नखमणि दीधिति दमित मनोजं ॥ इच्छसि यदि सततं सुख सारं । त्यजसि न किमिति विषय धृतभारं ॥ यदि बांछसि हरि भक्ति सुखं । कुरु चपलं शरणागत यत्नं ॥ प्राप्य सुदुर्ल्लभ नर वर देहं । परि हर सकल निगम संदेहं ॥ मानय हृदय मयोदित वचनं । तदया सिनो चेदतिशय पवनं ॥ वत्सपदं भावय भव जलधिं । अंत समै भवधिन बर्बधिं ॥ नाथ तबाह मतीरण रावं । पूरय सततं मिमं मयि भावं ॥ तब गुण गण कथिता मृत गाये । प्रार्थ्य मिदं दिश तव रघुनाथे ॥ ॥ दासयशा ॥ छंद ॥ दै भक्ति रमा निवास त्रास हरण शरण सुखदायकं ॥ सुपधाम राम नमामि काम अनेक कवि रघुनायकं ॥ १०४ ॥ सुर वृंद राजत द्वंद भंजन मनुज तनु अतुलित बलं ॥ ब्रह्मादि शंकर सेव्य राम नमामि करुणा कोमलं ॥ १०५ ॥ तोटक छंद ॥ गुण ज्ञान निधान अमान मजं । निति राम नमामि विभुं विरजं ॥ भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं । खल वृंद निकंद महाकुशलं ॥ १०६ ॥ बिनु कारण दीन दयालु हितं । छवि धाम नमामि रमा सहितं ॥ भव तारण कारण कार्य परं । मनसं भव दारुण दोष हरं ॥ ९० ॥ शर चाप मनोहर तूणि धरं । जल जारुण लोचन भूप वरं ॥ सुप मंदिर सुंदर श्रीरमणं । मद मार महा ममता शमनं ॥ ९१ ॥ ॥ खालशा कृत विनय पत्रिका ॥ भैरवी ॥ रे मन सन्त चरण धरु माथं । निस वासर जिनके जग नायक वास करत हैं साथं ॥ १ ॥ तिन को छोड़ विश्व में भटके वेश्याको करि नाथं । भक्ति सहित सेवा तुम करते वह मारत है लाथं ॥ २ ॥ तत्रापी कहु लाज न आवत मलत चरण धरि हाथं ॥ सिंह मदन गोपाल साधु पद गहु अघहर सम पाथं ॥ ३ ॥