पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपसंहारिणी टिप्पणी । १७३ ॥ सूरसागर ॥ राग काफी ॥ मैं अपने कुलकानि डरानी । कैसे श्याम अचानक आये मैं सेवा नहीं जानी ॥ यहै चूक जिय जानि सबी सुनि मन लै गये चुराई । तनतैं जात नहीं मैं जान्यौं लियो श्याम अपनाई ॥ ऐसे ठगत फिरत हरि घर घर भूलि कियो अपराध । सूर श्याम मन देहि न मेरो पुनि करिहौं अनुराग ॥ राग विहागरा ॥ कहा करौं गुरजन डर मान्यां । आये श्याम कौन हित करि कैं मैं अपराधििन कछु न जान्यों ॥ ठाढे श्याम रहे मेरे आँगन तब तैं मन उन हाथ विकान्यों । चूक परी मोकों सबही अंग कहा करौं गई भूल सयान्यों ॥ वै उनही को नए रूप मन मेरी करनी समुझि अयान्यों । सूर श्याम संगम उठि लाग्यौ मो पर बारं बार रिसान्यों ॥ ३७ ॥ बीच कियो कुल लज्जा आई । सुनि नागरी बकस यह मोकों सन मुख आये धाई ॥ चूक परी हरि तैं मैं जानी मन लै गये चुराई । ठाहे रहे सकुच तो आगैं राख्या बदन दुराई ॥ तुम हो बडे महर की चेटी काहे गई भुलाई । सूर श्याम हैं चोर तुम्हारे छांडि देहु डरपाई ॥ ९० ॥ ॥ कवि लल्लूलाल कृत ॥ दोहा ॥ धरम राज सौं चूक करि । दुरजोधन लै लीन्ह ॥ राज पाट अरु वित्त सब । घनेवास दै दीन्ह ॥ करी चूक प्रहलाद पै । हिरन असुर परचंड ॥ हरि सहाय हित अवतरे । असुरन किये बिखंड ॥ ॥ रामायण ॥ छमहु चूक प्रान जानत केरी । चहिये विप्र अरु कृपा घनेरी ॥ ॥ स्त्रियें गाया करती हैं ॥ मेरा भया चुक्यान हियारी । कार करत मैं घर वर चूकूं फुंका जात सई जीया री ॥ ॥ कबीर ॥ काशी का मैं बासी कहिये, करम दशा का हीना । राम भजन में चूक पडी तब पकर जुलाहा कीना ॥ : ॥ कहावत ॥ आहार चूके वह गये व्योहार चूके रह गये । दरबार चूके बह गये सुसराल चूके बह गये ॥