पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ उपसंहारिणी टिप्पण । चार नित्त हैं-तथापि एक यह दोहा भी हम कविवचनसुधा से उद्धृत कर के प्रमाण में प्रवेश करते हैं-"सत्त सुबचन कबीर के, चित्त देय सुन लेहु ॥ अरु नानक गुरु के वचन, सत्त मत्त करि गेहु" ॥ तथा लालशाकृत विनयपत्रिका में:-"दान्च मोत पात्र देख हर्ष सर्व सत्त लेप मे। दीन रेख मेख मार भाल मन्द के" । यह शब्द ऐसा अप्रसिद्ध नहीं है कि जिस के प्रयोग के विषय में हिन्दी भाषा के विद्वानों को किंचित् भी संदेह होय अतएव हम अधिक उदाहरण नहीं लिखते हैं ॥ २ श्रीमद्वल्लभ संप्रदाय में जो अष्ट-छाप कर के प्रसिद्ध हैं उन में के एक कुंभनदासजी ने "चावद्विसि हरि रूप रम्या" अपने एक कीर्त्तन में कहा है ॥ ३ इन भारत्थ । सारत्थ । और पारत्थ शब्दों के प्रयोग के विषय में हमने हमारी प्रथम संख्या में बहुत कुछ कह ही है परंतु फिर भी हम एक प्रमाण अष्ट-छापवाले छीत स्वामी के एक कीर्त्तन में से यह बताते हैं "भारत्थ में सारत्थ है हरि जू कहाये सारथी" और पंडित कन्हैयालालजी कृत छंद ! प्रदीप नामक ग्रंथ से वैसे ही अन्य शब्दों के प्रयोगों के उदाहरण भी विदित करते हैं यथा :-(१) करि गहि भार समत्थ । (२) यश पायो नृप मत्थ । (३) मत्यन नत करि लज्जित दिगज । (४) सुसज्जिय अगति । (५) उत्थिय समुद वट्ठिय लहरि । (६) रहि तदत्यक्ति जियसुलरि (७) लखि दव्वत सब नृपति (८) सिंहवली समरत्थ हत्थिवर मत्य विदारन ॥ ४ अब शेष चूक शब्द के विषय में भी हमारी लिखित संख्या में लिखे के सिवाय हमको यह कहना है कि उस के शब्दार्थ तौ वहीं हैं कि जो डाक्टर होर्नली साहब ने हिन्दी शब्दों की धातुओं के संग्रह में वर्णन किये हैं, किन्तु यह शब्द जिस विषय के प्रसंग में प्रयोग होता है वैसा ही उसका भावार्थ हो जाता है जैसे कि छन के अर्थ में अष्ट-छापवाले परमानन्ददासजी ने उस को प्रयोग किया है "अहो हरि बाँल सों चूक करी" इसी तरह समझ लेना चाहिये कि जब वह छल से मारने के प्रसंग में प्रयोग होता है तब उस का वैसा भावार्थ, ग्रहण किया जाता है । राजपूताने के किसी २ कवि को हमने ऐसा भी कहते हुए सुना है कि यह चूक शब्द राजपूताने की भाषा में ही प्रयोग हुआ मिलता है और हिन्दी भाषा के किसी काव्य में किसी भी अर्थ में यह शब्द प्रयोग नहीं हुआ है परंतु उनका यह कहना हमारे नीचे लिखे प्रमाणों से बिलकुल ही असत्य प्रतीत होता है ॥ ॥ वृन्द सतसही ॥ दोहा ॥ पिशुन छल्यो नर सुजन सों, करत विसास न चूक । जैसे दाध्यो दूध को पीवत छाछहि फूंक ॥ मूरख गुन समझै नहीं, तौ न गुनी में चूक । कहा भयो दिन की विभौ, देखौ जौ न उलूक ॥ ॥ नाथ कवि अर्थात् कवि लोकनाथजी चौबे कृत ॥ कवित्त ॥ सुखद रसाल को रिसाल तह तापै बैठि, ऐंठि बोल बोलै पिक, मधुप दुहू दुहू ॥ कुंज कुंज कारे हैं कुटिल अलि पुंज पुंज, गुंज गुंज फूल रस, चुहकै चुहू चुहू ॥ चूक बिन प्यारीं कीन्ह मेरो मन टूक टूक, कूक सुनै हूक परै, करत उहू उहू ॥ नाथ दिसि चार अंधियार ही जनात मोहि तातें किल कोकिला, कहत कुहू कुहू ॥