पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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है तब उस में Address अर्थात् अभिवादन अंग्रेजी भाषा में नहीं दिया जाता है ? क्या यह सब भाषा आज प्रचलित हैं और क्या आज मुसलमानों की बादशाहत है ? क्या जो आज हम महाराणाजी श्री सज्जनसिंहजी के राज्य शासन समय के सर्व प्रकार के सब राजकीय लेख एकत्र कर के देखें तो वे सब एक ही भाषा में हम को लिखे मिलेंगे ? क्योंकि क्या सब राजा साहबों के स्वर्गवास होने पर राज की मोहर छाप और स्टाम्प और सिक्के आदि में उसी दिन नवीन राजा साहब का नाम पलट कर के वैसे ही हुक्म जारी हो जाते हैं कि जैसे आज अंग्रेजी राज्य में होते हैं कि जिस राजकीय व्यवहार के संस्कार से विद्यमान पुरातत्ववेत्ता Antiquarians उपलब्ध पुरातत्वों को जांचा करते हैं ? क्या मेवाड राज्य में महाराणाजी श्री शंभूसिंहजी के नाम का स्टाम्प आज तक नहीं जारी है ? क्या महाराणाजी श्री सज्जन- सिंहजी के नाम की छाप वर्त्तमान महाराणाजी साहब के राज्य शासन समय में कई वर्षों तक नहीं जारी रही है ? क्या ऐसे स्टाम्प पर लिखी हुई दस्तावेजें और ऐसी छाप लगे पत्र बहुत समय के व्यतीत हो जाने पर जाली समझे जांयगे और जिन २ के पास यह राजकीय लेखादि उस समय में मिलेंगे वे सब जाल के अपराधी समझे जाकर क्या फांसी लगाये और कालेपानी भेजे जावेंगे ? सारांश हमारे निवेदन करने का यह है कि हिन्दी भाषा में अन्य देशीय भाषाओं के शब्दादि के मिलने का प्रश्न बड़ा ही सूक्ष्म और कठिन है और जो हमारी तरह विद्वान लोग यह मान लें कि जब जिस अन्य देशीय का आना हमारे भरतखंड में हुआ तब ही से उसकी भाषा के शब्दों का भी मेल होना अति संभावित है तो यह प्रश्न बड़ा ही सरल है । हमारे सिद्धान्त को माने बिना इस प्रश्न का निर्णय होना बहुत दुस्तर है क्योंकि जो चंद कवि के पहिले अथवा उसके समय के भी हिन्दी भाषा के पुस्तकादि मिल जांय और उनमें मुसलमानी भाषाओं के शब्द न भी मिलें तो भी हम सुखसे यह अनुमान कर सक्ते हैं कि उनके रचने वालों ने उनको जानकर प्रयोग नहीं किये हैं और चंद ने रूपक ३९ की प्रतिज्ञा पूर्व्वक प्रयोग किये हैं जैसे कि वर्त्तमान समय में भी हिन्दी भाषा के अनेक विद्वान अनेक प्रकार की हिन्दी लिखते हैं ॥ कविराजजी ने इस महाकाव्य की भाषा के प्रसंग में जैसे मुसलमानी शब्दों के प्रयोग होने का दोष दिया है वैसे ही उनों ने इन सत्त । चावद्विस । भारत्थ । पारत्थ । सारत्थ । और चूरू शब्दों को भी राजपूताने की कविता के ही शब्द होना समझ कर इस महाकाव्य का मेवाड राज्य में जाली बनना भी अनुमान किया है । तथा इस ग्रंथ में बहुत से शब्द अनुस्वार सहित प्रयोग हुए हैं उनके विषय में भी उनों ने महाकवि चंद पर आक्षेप करके यह कहा है कि "अनुस्वार लगाने से यह स्पष्ट जान पड़ता है कि वह संस्कृत कुछ भी नहीं जानता था क्योंकि उस को बिन्दु विसर्ग का भी ठीक ज्ञान न था" परंतु हमारी तुच्छ सम्मति में महामहोपाध्या कविराज श्री श्यामलदासजी महाशय का यह सब कहना बिलकुल ही असत्य और निर्मूल है । अब जो प्रमाण हमारे इस कहने को समर्थन करने को हम आगे दिखावेंगे उन से यह भी स्पष्ट सिद्ध होगा कि जिन २ ग्रंथों से हमने उन को उद्धृत किये हैं वे कविराजजी के पढ़ने में नहीं आये होंगे नहीं तो वे ऐसे अत्यन्ताभाव के अनुमान कदापि नहीं करते :- १ यद्यपि सत्त शब्द का आज कल की बोल चाल की ब्रजभाषा में भी प्रयोग होना हमने हमारी लिखित प्रथम संख्या में इन वाक्यखंडों के उदाहरणों से सिद्ध कर दिखाया है जैसे :- जबै वांकूं सत्त चढ़ आयौ तबै वो सत्ती भई-सत्त हर दंत गुह दंत दांता-राम राम सत्त है, दो