भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 173

१६२ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व ॥ चंद की स्त्री का उसे कहना कि अंग २ में हरि रूप रस वर्णन कर दिखाओ ॥ दूहा ॥ अंग अंग हरि रूप रस । विविधि विवेक वरेन ॥ सुकति समर्प्पन कंत रस । जुग तिनि जोग सरेन ॥ छं० ॥ ७८२ ॥ रु० ॥ ४१२ ॥ ॥ चंद का उत्तर दे कहना कि कान दे सुन मैं वर्णन कर दिखाता हूं ॥ दूहा ॥ कह्यो आंसि सौं कंत इम । जो पूछै तंत ओचि ॥ कान धरौ रसना सरसं । बन्नि दिषाऊं तोचि ॥ छं० ॥ ७८३ ॥ रु० ॥ ४१३ ॥ ॥ इति श्री कविचंद विरचिते पृथ्वीराज रासो को आदि पर्व्वनाम प्रस्ताव संपूर्ण ॥ ४१२ पाठान्तर :- विविध । वरचं । सुगति । जुंग । जोग । सरचं ॥ ४१३ पाठान्तर :- आंमिन । सौ । जो । पुछइ । पुछै । कांन । दिषांऊं नौहि ॥