पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ उपसंहारिणी टिप्पणी । यदि किसी को निश्चय करना हो तो इस आदि पर्व्व से ही गिन कर निश्चय करले । हां ऐसा तो हम निःसंदेह कह सक्ते हैं कि उस में अनेक फारसी शब्द हैं किन्तु बिना गिने ऐसी असात्य संख्या स्थिर नहीं कर सक्ते हैं ॥ २ ग्रन्थकर्त्ता ने रूपक ३८ में स्वयम् कहा है कि उस ने कुरान की भाषा का भी आश्रय किया है ॥ ३ ग्रंथकर्त्ता महाकवि चंद पंजाब देश के लाहौर नगर में उत्पन्न हुआ था, जहां कि उस के जन्म होने के १०० वर्ष पहिले से ही महमूदी सल्तनत का होना और उस का पृथ्वीराज जी के साथ ही साथ नाश होना तबक़ात नासरी से ही सिद्ध है। फिर क्या कोई विद्वान यह अनुमान कर सक्ता है कि इस सौ १०० वर्ष के समय में लाहौर नगर की भाषा में कोई एक भी शब्द मुसलमानी भाषा का नहीं मिल सका था और न चंद कवि एक भी फारसी शब्द जानता था और न उस के सुनने में कभी कोई एक भी फारसी शब्द आया था किन्तु वह इस वाक्य “नवदेत यावनी भाषा कंठे प्राण गते रपि” का ही अनुरूप था? क्या महमूदी सल्तनत के राज्य समय में कोई एक भी हिन्दू मुसलमान नहीं हुआ था, न कोई मस्जीद बनी थी, न कोई नगर आदि मुसलमानी नाम से बसे थे ? । ४ क्या पृथ्वीराजजी के राज्य की और महमूदी सल्तनत की परस्पर सीमा नहीं मिली हुई थी? क्या इन दोनों राज्यों के दूत एक दूसरे के राज्य में आते जाते और नहीं रहते थे ? क्या इन दोनों राज्यों में कभी एक बार भी कुछ परस्पर लिखने पढ़ने का काम नहीं पड़ा था? यदि परस्पर लिखा पढ़ी का काम पड़ा था तो क्या वह शुद्ध वैदिक संस्कृत भाषा में लिखा पढ़ी हुई थी और क्या महमूदी सल्तनत वाले भी संस्कृतादिमृतः प्राय भाषाओं में ही अपना राज कार भार चलाते थे? ५ क्या हसन निजामी आदि से हम को यह ज्ञात होता है कि पृथ्वीराजजी के राज्य समय में उन की सेवा में अथवा उन के राज्य में न तो कोई फारसी जानने वाला था न कोई सुलतान की ओर से कभी कुछ संदेसा लेकर पृथ्वीराजजी के पास गया, न कोई मुसलमान सिपाही थे, न कोई मुसलमान सौदागर था न कोई मुसलमान यात्री वहां आया था न कोई मुसलमान उन के आधीन देश में रहता था; मानो पृथ्वीराजजी के राज्य समय की हिन्दी भाषा को मुसलमानी भाषा की किंचित् वायु ही नहीं लगी थी ? क्या चित्ररेखा नाम की सुलतान शहाबुद्दीनजी गोरी की एक परम प्रिया पासवान को हसननामक का उड़ा लाना तबकातानासरी से कुछ भी सिद्ध नहीं होता और क्या यही सुभगा पृथ्वीराजजी की शरणागत में रह कर हमारी हिन्दुओं की बादशाहत को समूल नाश को प्राप्त कराने वाली नहीं हुई है ? ६ क्या सुलतान शहाबुद्दीनजी गोरी ने कई बार पृथ्वीराजजी और लाहौर की महमूदी सल्तनत पर चढ़ाईयां नहीं कियीं थीं ? क्या इन अवसरों में भी जो फारसी शब्द चंद ने प्रयोग किये हैं वह चंद और पृथ्वीराजजी की सेना के सुनने और समझने में कभी नहीं आये थे और न उन में का कोई एक शब्द भी उन की भाषा में मिल गया था ? क्या जब शहाबुद्दीनजी ने लाहौर की महमूदी सल्तनत पर चढ़ाईयां कियीं तब लाहौर वालों ने पृथ्वीराजजी से कुछ मंत्रणा नहीं कियी थी और न उन की कुछ सहायता लियी थी ? ७ क्या मसूद ने हांसी पर चढ़ाई नहीं कियी थी? क्या वह लाहौर के एक वाईसराय Viceroy के साथ बनारस तक नहीं आया था और न उसने उस शिवपुरी को लूटा था? क्या इस समय में भी कोई एक भी शब्द मुसलमानी भाषा को हमारी हिन्दी भाषा में नहीं मिला था ?