भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 470 में से

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पृष्ठ 161

१५० पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व (ख) कविराजजी ने कवि के कहे "बारमै सूर सो करन रंग" पर ही विशेष दोष दिया है और उसका बारहवें घर में होना असंभव माना है तथा इतनी ही बात पर दोष देकर अन्य ग्रहों का कुछ शोध नहीं किया है। परंतु जो वे रूपक ३६२ के तीसरे चरण पर कुछ थोड़ी सी भी दृष्टि देते तो उनको मालूम हो जाता कि चंद कवि मेष का सूर्य होना स्वयम् कहता है कि जो संभव भी हैं "दुतिया गुरु मेषह तरनि" इस से यह भी समझ सक्ते थे कि जब मेष का सूर्य बारहवें घर में होना कवि कहता है तब वृष लग्न भी है और "ऊषा प्रकाश इक घरिय रात" से कवि का गूढार्थ भी यह है कि पृथ्वीराजजी का सूर्योदय के पश्चात् जन्म होने से ऊषा एक घड़ी थी अर्थात् ऊषा के एक घड़ी पीछे उनका जन्म हुआ ॥ (ग) कविराजजी के खंडन ग्रंथ में 'गुरू सिद्दु जोग चित्रा नखत्त' पाठ से सिद्दु योग ग्रहण किया है कि जो चित्रा नक्षत्र के साथ वा पास आना असंभव है परंतु थोड़ी सी भी सूक्ष्म दृष्टि देकर देखते अथवा पुस्तकान्तर में पाठ देखते तो कितनेक पुस्तकों में सिद्धि पाठ जैसे हम को मिल गया वैसे मिल जाता ॥ (घ) कविराजजी ने अपने खंडन ग्रंथ में बड़ी २ सूक्ष्म युक्तियों से सूक्ष्मतर अनुमान किये हैं परंतु एक इस स्थान पर वे बड़ी ही बेतरह चूक गये हैं। उन्हों ने 'गुरु नाम करन सिसु परम हित्त' का गुरु पाठ से धोखा खाकर यह अर्थ किया है कि 'गुरु ने बड़े प्रेम से बालक का नाम रक्खा' किंतु यह अर्थ बिलकुल ही असत्य है। यद्यपि इस गुरु पाठ का पुस्तकान्तर में गर पाठ स्पष्ट मिलता है परंतु वह न भी मिले तथापि पुरातत्त्ववेत्ता विद्वान इस छंद की प्रत्येक तुक की एक दूसरी से संगति मिला कर भले प्रकार जान सक्ते हैं कि कवि "तिथि वारं च नक्षत्रं योगं करण मेवच" के अनुसार यहां यह कहता है कि "गर नामक करण शिशु को परम हितकारी है" न कि यह कि-गुरु ने बड़े प्रेम से बालक का नाम रक्खा-हमारे हे सज्जन पाठको! आप सोचो, विचारो, न्याय करो, और सत्य २ कहो कि यह महा अनर्थ करने वाली भूल है कि नहीं और जो हम इतना परिश्रम केवल स्वदेश वत्सलता से उत्थापित हो कर न करते तो हमारे देश की हिन्दी भाषा और ऐतिहासिक विद्याओं की कितनी हानि संभव थी। राजपूताने के कितनेक कवि लोग अपने को हिन्दी भाषा के काव्यों में ऐसा उत्कृष्ट समझते हैं कि मानो अन्यदेशीय उनके आगे कुछ माल ही नहीं है परंतु इस अवसर पर हमको मिस्टर जोन बीम्स साहब Mr. John Beames का यह कहना स्मरण आता है कि "The Pandits of Rajputana even do not understand Chand beyond the general drift of the poem." "राजपूताने के पंडित भी चंद के काव्य को उसके एक साधारण भावार्थ के सिवाय नहीं समझते हैं" ॥ (ङ) कविराजजी के लिखे पाठ में "पंच में थान परिसोम भोम" है और हम को पुस्तकान्तर में "पंच दुग्ग थान परि सोम भोम" पाठ मिला है। क्या इस से जन्म पत्री के ग्रहों में कुछ अंतर नहीं पड़ जाता है? और क्या जब तक कि अनेक प्राचीन पुस्तकों से इन रूपकों का पाठ मिलान कर के शुद्ध न किया जावे तब तक जन्मपत्री को अशुद्ध कह देना मानों सहसा सिद्धान्त कर लेना नहीं है? यदि कोई २ विद्यमान पुरातत्त्ववेत्ता अपने सहसा सिद्धान्त कर लेने को अच्छा समझ लेना अयोग्य नहीं समझेंगे और वे इस प्रचार को एक कलम बंद नहीं कर देंगे तो पुरातत्त्वविद्या को निःसीम हानि पहुंचनी संभव है। यहां कन्या का चंद्रमा और पृथ्वीराजजी का पृथ्विीराज नाम होने के कारण उनकी कन्या राशि का होना स्पष्ट है। और