भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 470 में से

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आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ। १५१ ॥ पृथ्वीराजजी के जन्म होने पर क्या २ आश्चर्यदायक बात हुई ॥ कवित्त ॥ भयौ जनम पृथिराज । ढुग्ग पर छरिय सिपर गुर ॥ भयौ भूमि भूचाल । धमकि धम धम्म अरिनि पुर ॥ गठन कोट सें लोट । नीर सरितन बहु वढ्ढिय ॥ भै चक भय भूमिया । चमक चक्रित चित चट्टिय ॥ घुरसान थान पन्न भल परिय । ग्रभ पात भय ग्रभनिय ॥ बेताल बीर विकसे मनह । हुंकारत पच्छ देवनिय ॥ छं० ॥ ७१६ ॥ रु० ॥ ३६४ ॥ ॥ पृथ्वीराजजी की बाल अवस्था के चरित्रों का वर्णन ॥ कवित्त ॥ वरष वधै विय बाल । पिथ्य वढ्दै इक मासह ॥ घरी दीघ पल पध्य । मास लखिय त्रप तासद्द ॥ मनिगन कंठला कंठ । महि केहरि नष सोहत ॥ घूघर वारे चिहुर । रुचिर वानी मन मोहत ॥ ज्योतिष शास्त्र के एक अचल धुवे के अनुसार यह अनुमान कर लेने का काम भी चंद ने हमारे ऊपर ही छोड़ दिया है कि कन्या के चंद्रमा के साथ केतु भी है क्योंकि राहु और केतु सदा परस्पर सात में स्थान में रहते हैं ॥ ३६४ पाठान्तर:-जन्म । प्रिथीराज । पृथीराज । प्रथ्यिराज । दुग । डुंग । भूबाल । धंम । कोट । सै । लोट । वहि । वढिय । भैचक्क भय भूमियान । भय चक्रित भूमिया । चमकि । चढिय । घुरसांन । धांन । परीय । यभ । यभ । वैताल । विकसैं । नयन । हुंकारन । दैवनीय ॥ इस रूपक में जो कुछ आश्चर्यदायक बातों के भाव कवि ने कहे हैं वह कोई वास्तविक आश्चर्य नहीं है किन्तु कवि लोग बड़े २ प्रतापी पुरुषों के जन्मादि के वर्णन में अद्भुत रस का प्राश्रय करके प्रायः ऐसा प्रसंग बांधा करते हैं । देखो जैसे यहां "धमकि धम धम्म अरिन पुर" अथवा 'घुरसान थान पल भल परिय" कवि ने कहा है । वैसे ही तबकात नासरी नामक फारसी तवारीख़ में देखो कि महमूद गज़नी जिस रात्रि को उत्पन्न हुआ था उसी समय सिन्धु नदी के किनारे के एक मंदिर का फट जाना उस में लिखा है । उस से केवल इतना ही समझ लेना चाहिये कि महमूद मंदिरों को भ्रष्ट करने और मूर्तियों को तोड़ फोड़ डालने वाला हुआ है अतएव कवि ने उस के जन्म समय भी वैसा ही उस के प्रताप का एक चिन्ह वर्णन किया है । इस रूपक में बीर और अद्भुत रस मिले हुए हैं अंतएव आतेप करने वाले अथवा किसी कोमल हृदय वाले मनुष्य के कान उस के पढ़ते ही खड़े हो जाते हैं, अर्थात्, रस अपना प्रभाव उस को प्रत्यक्ष दिखा देता है ॥ ३६५ पाठान्तर :- बघे । पिथ । बाधे । पल पलघ । पष्य । पष । लष्यीय । लषीय । घष । मनिगनि । कंठला । मधि । केहरि । सौहत । वाले कैंस । वारे केस । केसरि । सुमंडि । सुंमं । दरसन । ज्योति । ज्योति । जरत । रक । किन । हुलसि । परत ॥

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