भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 470 में से

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पृष्ठ 160

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और सटीक देवनागरी पाठ (ट्रांसक्रिप्शन) प्रस्तुत है:

[ आदि पर्व ] | पृथ्वीराजरासो । | १४६ जिस का चंद का आश्रय करना उसकी शैली से अनुमान होता है। इस प्रकार से शोध होने पर हम इस जन्मपत्री के विषय में जिन विद्वान के गणित के अनुसार जो बात निश्चय होगी वह प्रकाश करेंगे। किन्तु अभी हम कुछ उन शंकाओं के विषय में भी कहते हैं कि जो इस विषय में महामहोपाध्याय कविराज श्री श्यामलदासजी ने कवि का सरल और स्पष्ट अर्थ न समझ कर केवल प्रतिदून-अनुमान-जन्यभ्रम के वश हो अपने खंडन-ग्रंथ में कियी हैं:- १ प्रथम कविराजजी ने पृथ्वीराजजी के जन्म संवत् के प्रकाश करने वाले रूपक ३५५ के साथ का रूपक ३५६ जैसे अपने खंडन-ग्रंथ में छोड़ दिया है वैसे ही यहां भी उन्होंने रूपक ३६२ को छोड़ कर केवल रूपक ३६३ के आधार पर जन्मपत्री के संबन्धित दोष दिये हैं। इन दोनों स्थलों को हमारे विद्वान पाठक विचार कर समझ सक्ते हैं कि रूपक ३५६ और ३६२ को छोड़ देना उचित था कि नहीं और उन का रूपक ३५५ और ३६३ के साथ पूर्ण संबन्ध है कि नहीं। यदि पूर्ण संबन्ध है तो निर्णय करने के समय उन का त्याग देना किसी वास्तविक पुरातत्ववेत्ता के लिये कैसा अनुचित कर्म है ॥ २ दूसरे जो कुछ दोष इस विषय में दिये गये हैं वह मालूम होते हैं कि किसी एक पुस्तक के पाठ पर ही दिये गये हैं। किन्तु मैं आशा करता हूं कि डाक्टर हार्नली साहब कि जिनों ने अपने हाथ से रासे के कुछ भाग को बड़ी सूक्ष्म दृष्टि देकर शोधा है वे भले प्रकार साक्षी दे सक्ते हैं कि इस ग्रंथ के पाठान्तर, अपपाठ, विशेष पाठ और न्यून पाठ आदिक की क्या दशा है और क्या किसी एक पुस्तक के पाठ पर ही किसी बात का निर्णय होना उचित है ॥ ३ तीसरे यदि रूपक ३६२ न छोड़ दिया गया होता और पुरातत्ववेत्ताओं के निर्णय करने की रीति से ध्यान दिया गया होता तो कविराजजी अपनी कितनीक शंकाओं के समाधान स्वयम् इन रूपकों और भिन्न २ पाठान्तरों से जान सक्ते थे जैसे कि:- (क) रूपक ३६२ से पृथ्वीराजजी के जन्म की दूज तिथि ज्ञात होती है। यदि तिथि की संख्या का शब्द अशुद्ध भी हो तो भी हम कवि के कहे चित्रा नक्षत्र से स्पष्ट अनुमान कर सक्ते हैं कि या तो यह दूज कवि ने पड़वा उपरान्त की ग्रहण कियी है अथवा किसी और तिथी की संख्या वहां भ्रष्ट हो गई है। हम ज्योतिष शास्त्र तो नहीं जानते हैं किन्तु हम लोग पंचद्रावड़ ब्राह्मणों में अभी तक प्राचीन प्रणाली चली आती है कि यज्ञोपवीत होने पर सात वर्ष के बालक को भी पितादि वेदाङ्गों के कुक धुवे अर्थात् गुरु सिखाये कहते हैं उन के अनुसार हम यह कह सक्ते हैं कि हमारे आर्य मासों के नाम नक्षत्रों पर से पड़े हैं और प्रत्येक महिने का नक्षत्र शुदी १४ किंवा पूनम अथवा वदी प्रतिपदा के दिवस में होता है अतएव इस दूज के स्थान में कोई ऐसी ही तिथि थी कि जो भ्रष्ट हो गई है। देखो कविराजजी ने "वैसाख तृतीय पख कृष्ण लग्न" पाठ लिखा है उस के स्थान में हम को सं० १६४७ । १७९० और १८४५ की पुस्तकों में यह "वैसाख मास पष कृष्ण लग्न वा अग्न" पाठ लिखा मिलता है और वह एक प्रकार से ठीक भी दीखता है क्योंकि रूपक ३६२ में कवि तिथि कह आया है अतएव अब वह यहां शेष मास और पक्ष कहता है। चित्रा नक्षत्र के विषय में कुछ गोलमाल किसी पुस्तक में दृष्टि नहीं आती और वैशाख के विषय में कुछ गड़बड़ सी दीखती है अतएव जो कोई चित्रा से चैत्र मास का होना अनुमान करें तो हमारी सम्मति में तो वह कोई आश्चर्य दायक बात नहीं है ॥

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