पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदसम समय ६ ] पृथ्वीराजरासौ । १८६ धजा धूसरं अंमरं चंव दख्खी । तिनं सखरू घोडष्कला अप्प सुख्खी ॥ १०० ॥ धरे गेन पानं खरे आवधानं । सनों आसुरं वासूरं सत्त पानं ॥ करक्कंत मच्छी कटिं कहि मच्छं । मनो आवधं वज्जि जौं वज्र वक्छं ॥ १०१ ॥ धपे पानि रुद्धं फटे पारि छेदं । कढे पेट सखरूं सुरं वेद वेढं ॥ धरे अप्प पानं चले ब्रह्म थानं । किये जैत बज्जैं पुरानं सुरानं ॥ १०२ ॥ करी विष्टि फूंलं सुरं सिद्ध देवं । सुचं ब्रह्म जष्यं कियं अप्प सेवं ॥ सुषं वेद पिठ्ठं न लै पानि ब्रह्मं । जन्ने षोन्नि पानं भजै अंति भ्रमं ॥ १०३ ॥ † दियं चारनं भट वेदं सु पानो । रहे ब्रह्म ग्यानं हरी सिद्धि रानी ॥ अपं इंद्र आपं भगं कोरि कोरं । कियं मक्छ रूपं छुटे वेद रोरं ॥ छं० ॥ १०४ ॥ रू० ॥ ११ ॥ ॥ कच्छावतार की कथा ॥ दूहा ॥ मंडि गजिन बहु बज उच्चर । तत्त कत्त बज जल जाल ॥ मँदिराचल्ल बज विपुल पुल । थल्ल थरचर छल पाल ॥ छं० ॥ १०५ ॥ रू० ॥ १२ ॥ दंडमाली ॥ धरि कच्छ रूप सरूपयं । कुस कूप मंडित भूपयं ॥ धरि मंद प्रब्बत पुठ्ठयं । जल जात चाज गरिठ्ठयं ॥ १०६ ॥ † हमारे पाठकों को यह स्मरण में रखना योग्य है कि चंद के इस वाक्य "दियं चारनं भट्ट वेदं सु पानी" से वास्तव में चाहे यह ऐसा ही हुआ हो अथवा न हो किंतु ज्ञात होता है कि इन दोनों जाति के मनुष्यों में जो वर्तमान समय में अनबन दृष्टि आती है वह चंद के समय में विद्यमान न थी किन्तु कुछ थोड़े ही काल से उस का जन्म हुआ है। यदि हम यह भी मान लें कि चंद के समय में इन दोनों जातियों में परस्पर विरोध था; तथापि चंद कवि प्रशंसा करने के योग्य है, क्योंकि उसने चारनों का नाम अपने इस ग्रंथ में कहीं नहीं छिपाया है बरुक पहिले उन का नाम उसने प्रयोग करके फिर अपनी जाति का नाम प्रयोग किया है। तथा इन दोनों जाति के मनुष्यों की उत्पत्ति के शोधकों को यह वाक्य बारहवें शतक तक का प्रमाणरूप भी उपलब्ध समझना चाहिये। इस महाकाव्य में आगे अनेक स्थानों में ऐसे प्रयोग आवेंगे। इन दोनों जातियों की उत्पत्ति के विषय में अनेक प्रकार के शंका समाधान हैं। परंतु इन लोगों की उत्पत्ति का कुछ विषय हमारे पास एकत्र किया हुआ है वह अवकाश मिलने पर यदि कहीं आवश्य- कता हुई तौ हम किसी टिप्पण में लिख विदित करेंगे ॥ ब्रह्म । जल । जलं । षोलि । बोलिं । पांन । चति । भ्रमं । वैदं । पांनी । हरै ब्रहम ग्यान हरि सिद्धि रानी । हरे । रांनी । अयं । इद्र । भग्गै । भगे । कोर । सौर । कोर कोडिरं । किय मन रूप छुटै वैद जोर । मद्ध । छूटे ॥ १२ पाठान्तर :-गजि गन । उर । मंदिरा । बव ॥ १३ पाठान्तर :-छंद दंडमाली । कच्छ । खुस । कुंप । जुयंयं । नूपयं । प्रबत । पुठयं । गरिडयं । गरिठयं । गरिष्ठयं । वांम । दिन । अदिन । वस । प्रचंडयं । श्रुति । सुति । अहिगुन । गुनगानं ।