पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 202, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंदसम समय ११ ] ˙ पृथ्थीराजरासौ । १६१ दियं सराप देवता । त्रिलोक मध्य तेवता ॥ अ्रवंत लच्छिमी गई । नराधि देव निम्मईं † ॥ न केसवं न दानवं । न नागयं न भानवं ॥ युँ देवता विचारयं । नच्ची सनाच भारयं ॥ दईत भग्गि दूरयं । युँ देव दूत झूरयं ॥ मिले त्रिलोक संमिली। बिना पराग विछली ॥ कछावतार किद्ध्यं । लक्खि जीत लिद्ध्यं ॥ मदाचलं महा गिरं । धरे सु पिष्ठ उप्परं ॥ सु नाग नेत किद्ध्यं । मछा समंद मंथयं ॥ दईत मुष्प दष्षयं । सु पुच्छ देव रष्षयं ॥ विरे। ल्ति दृष्टि ज्यौं मची। घटा तटाक घूम ची॥ लियं प्रथम लच्छमी। सु कौस्तुभं च वळ्कमी ॥ सु पारिजात पानयं। सु राधनंत मानयं ॥ जु सोम उग्गि सुक्कला। सु धेन गज्ज उज्जला ॥ सु रंभ मोच्छिनी परी। सु सप्त अश्व सुन्दरी ॥ धनुष्य ईस संषयं । विषं समेत पष्वयं ॥ सु चारि दिस्स पंचची। दिए सु देव संचची ॥ दईत वंस दभ्भयं। सु नाग फेन मम्भयं ॥ कितेक सेन कुक्कची। मुणंति मान मुक्कची ॥ लियं सु रत्न इंदयं । दईत किद्ध दंडयं ॥ अमृत्त अप्प अच्छरं । कियं सु देव कत्तरं ॥ अनाथ नाथ अष्वियं । दईत देव चष्वियं ॥ पर्वंत दोय पप्पिली । दईत देव रुप्पली ॥ अमृत्त देव पिद्ध्यं । सुरा सु दैत सिद्ध्यं ॥ जु सोमनाथ सं। कची। रवी सुरा सु देत ही ॥ हरी सु चक्र सद्धयं। जु दैत वंस बद्धयं ॥ छंदं० ॥ ११३-१२८ ॥ रू० ॥ १७ ॥ कवित्त ॥ दानव तब गय दौरि । करे इक बंध कटकं ॥ हुअ देवासुर जुद्ध । चढे देवता चटकं ॥ घरे रथ्थ दष्षरे । आइ लग्गे सम धारं ॥ रथ सौं रथ भंजियहि । कूक लग्गी पुक्कारं ॥ जोगनी जोग माया जगी । नारद तुँवर निच्छसिया ॥ दस एक रुद्र दांरद्र गत । दानव तामर चस्सिया ॥ छंदं० ॥ १३० ॥ रू० ॥ १८ ॥ अच्छरं । अच्चर । कत्तरं । कच्छरं । आथ । अप्पयं । दांनव । दानव । चपय । चपयं । पावत । पावंत । दोय । पपली । दानव । रुपली । अमृत । दैव । सुरा ज । सुरा जु । ज्यु । सोमनाथ । रची सुरा स दौर ही । संधियं । सदयं ॥ † इस महाकाव्य में मुसलमानी भाषा के शब्द प्रयोग हुए देख कर शंका करनेवालों को जानना और विचारना चाहिये कि किसी पुस्तक में फौज और किसी में सेन पाठ मिलते हैं । क्या यह दोनों पाठ चंद ने प्रयोग किये हैं ? १८ पाठान्तरः-गय तब । करै । कटकं । कटकं । दैवासुर । चढै बता चटक । चढै । चटकं । घरै । रथ । पषरै । पषरे । लग्गै । सम धार । सुं । सों । लगो । पुकर । पुकारं । जुगिनी । जोग । तुंबर । विच्छसिया । द्ररिद्र । तांमर । हसिया ॥