पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 21, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंTHE PRITHÍVÍRÁJ RÁSÁU. पृथ्वीराजरासौ। मोहनी टिप्पणी सहित । आदि पर्व। ॥ आदिदेव, गुरू, वाणी, लक्ष्मीश, सुरनाथ और सर्वेश का ॥ ॥ मंगलाचरण ॥ साटक-छँ ॥ आदी देव प्रमत्थ नम्य गुरयं, वानीय बंदे पयं । सिष्टं धारन धारयं वसुमती, लच्छीस चर्नाग्रयं ॥ तं गुं तिष्ठति ईस दुष्ट दछनं, सुरनाथ सिद्धिग्रयं । थिर्चजंगल जीव चंद नमयं, सर्वैस वर्दामयं ॥ छंद ॥ १ ॥ रूपक ॥ १ ॥ १ यह मंगलाचरण जिस छंद में चंद कवि ने कहा है उस का नाम उन ने साटक प्रयोग किया है और इस नाम से यह छंद आज कल जो छंद ग्रंथ प्रायः उपलब्ध हैं उन में नहीं मिलता। यद्यपि उस की परीक्षा करने से वह निःसंदेह शार्दूलविक्रीड़ित नामक छंद मालूम होता है परंतु जब तक उस का लक्षण अथवा नामान्तर होने का कोई प्रमाण नहीं दिखलाया जावे तब तक पुरातत्त्ववेत्ता विद्वान संतुष्ट नहीं हो सक्ते। अतएव बहुत खोज करने से मेरी मातृभाषा गुजराती के काव्यों में इस नाम के छंद मुझे मिले और The Revd. Joseph Van. S. Taylor साहब अपने गुजराती भाषा के व्याकरण के पद्यबंध अथवा छंदविन्यास नामक प्रकरण के पृष्ठ २२३ में उसको साटका नाम से कुल्ल ३८ अक्षर के दो तुक का छंद होना लिखते हैं कि जिसके प्रत्येक तुक में १२ + ७ = १९ अंतर होते हैं। इस के सिवाय प्राकृतभाषा के किसी छंदग्रंथ से अनुवाद होकर सं० १७७६ में जो एक रूपदीप पिंगल नामक छंद ग्रंथ बना है उस में केवल ५२ छंदों के लक्षण कहे हैं उस में भी साटक का यह लक्षण लिखा हैः- ॥ साटक छंद लक्षण ॥ फर्में द्वादश अंक आद संग्या, मांचा खिवो सागरे । दुज्जी वी करिके कलाष्ट दस वी, अर्को विरामाधिकं ॥ १ ॥ अंते गुर्वे निहार धार सब के, औरों कछू भेद ना। तीखां मत्त उन्नीस अंक चरने, सेखो भणै साटिकं ॥