भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 470 में से

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२ पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व

मैं इस साटक छंद को पिंगल छंद सूत्रम् नामक ग्रंथ में कहे शार्दूलविक्रीडित छंद का नामान्तर होना मानता हूं और उस का लक्षण बहुत प्राचीन अमर और भरत कृत छंद ग्रंथों में अवश्य होना अनुमान करता हूं क्योंकि चंद कवि ने भी अपने इसी ग्रंथ के आदि पर्व के रूपक ३७ में जो कुछ कहा है उस से स्पष्ट मालूम होता है कि उस ने अपने इस महाकाव्य के रचन में पिंगल अमर और भरत के छंद ग्रंथों का आश्रय किया है ॥ इस छंद के लक्षण का पता लगाकर अब मैं इस रूपक के पाठ को शोधता हूं । उस की पहिली पंक्ति का पाठ A. S. B. की छापी हुई पुस्तक की Fasiculus I जिस को Mr. John Beames साहब ने शोध कर छपाई है उस में "आदि प्रनम्य नम्य गुरयं वानीय वंदे परं" ऐसा पाठ है और जो Mr. F. S. Growse C. S. M. A. ने रासे के प्रारंभ के छंदों का अनुवाद करने में पाठ लिखा है वह भी ऐसा ही है । निदान साटक के लक्षण के अनुसार इस तुक में १२+७=१९ अक्षर होने चाहिये परंतु उस में १०+७=१७ अक्षर हैं। अब यह अत्यावश्यक है कि घटते हुए दो अक्षरों का पता लगाया जावे । जिस में यह कल्पना करना कि चंद कवि अथवा उस के नाम से कोई यह जाली ग्रंथ बनानेवाला छंद ग्रंथों में भले प्रकार व्युत्पन्न न होने के कारण मूल में ही भूल गया है सर्वरीत्या अयोग्य और आश्चर्यदायक बात है । क्योंकि वर्तमान् पृथ्वीराजरासे का बिगड़ा हुआ काव्य भी अपने कर्त्ता का एक बड़ा व्युत्पन्न कवि होना स्वयम् स्पष्ट प्रकाश करता है अतएव उस का ऐसी भूलों का करना निर्मल प्रज्ञावाले विद्वानों के ध्यान में सर्वथा असंभव है । इस प्रथम तुक में जो दो अक्षर घटते हैं वे पंक्ति भर में किस स्थान में लेखक अथवा शोधक की भूल से लोप हो गये हैं। इस बात को शोध लेने के लिये यह एक बड़ी सरल युक्ति है कि हम इस तुक के अर्थ को ध्यान में लेकर उस के वाक्यखंडों को पृथक् २ कर दें कि जिस से अपूर्ण वाक्यखण्ड अपने आप हम को घटते हुए अक्षर बतला देवे जैसे कि वानीय वंदे परं और नम्य गुरयं और आदि प्रनम्य । ऐसा करने से हम को मालूम हो गया कि आदि प्रनम्य वाक्यखंड अपूर्ण है और उस में कोई संज्ञावाचक शब्द घटता है । अब विचारना चाहिये कि वह संज्ञा- वाचक शब्द आदि शब्द के पहिले घटता है अथवा पीछे । जो हम आदि शब्द के पहिले उस का होना कल्पना करें तो 'आदिः पदान्ते गण सूचकः" से दोष प्राप्त होकर हमारी कल्पना अन्यथा हो जाती है अतएव मानना चाहिये कि आदि शब्द के पीछे कोई संज्ञावाचक शब्द है क्योंकि ऐसा मानने में आदि शब्द उस शब्द के साथ मिलकर हम को कर्म्मधारयः समास का होना स्पष्ट विदित करता है। जब कि यह निश्चय हो गया कि आदि शब्द के पीछे अर्थात् आदि और प्रनम्य के बीच में कोई संज्ञावाचक शब्द गया है तब हम को फिर सूक्ष्म विचार में निमग्न होना चाहिये कि वह संज्ञावाचक शब्द कौन सा है कि जिस को चंद कवि ने प्रयोग किया था। मैं निःसंदेह कल्पना करता हूं कि यहां देव शब्द था अर्थात् आदि देव ऐसा पाठ चंद ने प्रयोग किया था क्योंकि प्रथम तो "आदिः कारणं स च देवश्चेति कर्म्मधारयः" तथा "जग दुपादानादिगुणवान् नारायणः" दूसरे आदिदेव शब्द हमारी संस्कृतभाषा के प्रामाणिक ग्रंथों में मंगलाचरणों तथा ईश्वर की स्तुति तथा ईश्वर के ध्यान के वाक्यों में बहुधा प्रयोग किया गया है कि हम उदाहरण के लिये केवल दोही प्रमाण यहां दिखाते हैं जैसे :- "परं ब्रह्म परं धाम । पवित्रं परमं भवान् ॥ पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुं" ॥ तथा "त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण । स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानं" ॥ तीसरे चंद कवि ने स्वयम् अपने इस महाकाव्य में इस आदि देव शब्द का प्रयोग अनेक स्थानों में किया है जैसा कि:- "प्रनम्य प्रथम मंम आदि देवू । ॐकार