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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

२ पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व

मैं इस साटक छंद को पिंगल छंद सूत्रम् नामक ग्रंथ में कहे शार्दूलविक्रीडित छंद का नामान्तर होना मानता हूं और उस का लक्षण बहुत प्राचीन अमर और भरत कृत छंद ग्रंथों में अवश्य होना अनुमान करता हूं क्योंकि चंद कवि ने भी अपने इसी ग्रंथ के आदि पर्व के रूपक ३७ में जो कुछ कहा है उस से स्पष्ट मालूम होता है कि उस ने अपने इस महाकाव्य के रचन में पिंगल अमर और भरत के छंद ग्रंथों का आश्रय किया है ॥ इस छंद के लक्षण का पता लगाकर अब मैं इस रूपक के पाठ को शोधता हूं । उस की पहिली पंक्ति का पाठ A. S. B. की छापी हुई पुस्तक की Fasiculus I जिस को Mr. John Beames साहब ने शोध कर छपाई है उस में "आदि प्रनम्य नम्य गुरयं वानीय वंदे परं" ऐसा पाठ है और जो Mr. F. S. Growse C. S. M. A. ने रासे के प्रारंभ के छंदों का अनुवाद करने में पाठ लिखा है वह भी ऐसा ही है । निदान साटक के लक्षण के अनुसार इस तुक में १२+७=१९ अक्षर होने चाहिये परंतु उस में १०+७=१७ अक्षर हैं। अब यह अत्यावश्यक है कि घटते हुए दो अक्षरों का पता लगाया जावे । जिस में यह कल्पना करना कि चंद कवि अथवा उस के नाम से कोई यह जाली ग्रंथ बनानेवाला छंद ग्रंथों में भले प्रकार व्युत्पन्न न होने के कारण मूल में ही भूल गया है सर्वरीत्या अयोग्य और आश्चर्यदायक बात है । क्योंकि वर्तमान् पृथ्वीराजरासे का बिगड़ा हुआ काव्य भी अपने कर्त्ता का एक बड़ा व्युत्पन्न कवि होना स्वयम् स्पष्ट प्रकाश करता है अतएव उस का ऐसी भूलों का करना निर्मल प्रज्ञावाले विद्वानों के ध्यान में सर्वथा असंभव है । इस प्रथम तुक में जो दो अक्षर घटते हैं वे पंक्ति भर में किस स्थान में लेखक अथवा शोधक की भूल से लोप हो गये हैं। इस बात को शोध लेने के लिये यह एक बड़ी सरल युक्ति है कि हम इस तुक के अर्थ को ध्यान में लेकर उस के वाक्यखंडों को पृथक् २ कर दें कि जिस से अपूर्ण वाक्यखण्ड अपने आप हम को घटते हुए अक्षर बतला देवे जैसे कि वानीय वंदे परं और नम्य गुरयं और आदि प्रनम्य । ऐसा करने से हम को मालूम हो गया कि आदि प्रनम्य वाक्यखंड अपूर्ण है और उस में कोई संज्ञावाचक शब्द घटता है । अब विचारना चाहिये कि वह संज्ञा- वाचक शब्द आदि शब्द के पहिले घटता है अथवा पीछे । जो हम आदि शब्द के पहिले उस का होना कल्पना करें तो 'आदिः पदान्ते गण सूचकः" से दोष प्राप्त होकर हमारी कल्पना अन्यथा हो जाती है अतएव मानना चाहिये कि आदि शब्द के पीछे कोई संज्ञावाचक शब्द है क्योंकि ऐसा मानने में आदि शब्द उस शब्द के साथ मिलकर हम को कर्म्मधारयः समास का होना स्पष्ट विदित करता है। जब कि यह निश्चय हो गया कि आदि शब्द के पीछे अर्थात् आदि और प्रनम्य के बीच में कोई संज्ञावाचक शब्द गया है तब हम को फिर सूक्ष्म विचार में निमग्न होना चाहिये कि वह संज्ञावाचक शब्द कौन सा है कि जिस को चंद कवि ने प्रयोग किया था। मैं निःसंदेह कल्पना करता हूं कि यहां देव शब्द था अर्थात् आदि देव ऐसा पाठ चंद ने प्रयोग किया था क्योंकि प्रथम तो "आदिः कारणं स च देवश्चेति कर्म्मधारयः" तथा "जग दुपादानादिगुणवान् नारायणः" दूसरे आदिदेव शब्द हमारी संस्कृतभाषा के प्रामाणिक ग्रंथों में मंगलाचरणों तथा ईश्वर की स्तुति तथा ईश्वर के ध्यान के वाक्यों में बहुधा प्रयोग किया गया है कि हम उदाहरण के लिये केवल दोही प्रमाण यहां दिखाते हैं जैसे :- "परं ब्रह्म परं धाम । पवित्रं परमं भवान् ॥ पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुं" ॥ तथा "त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण । स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानं" ॥ तीसरे चंद कवि ने स्वयम् अपने इस महाकाव्य में इस आदि देव शब्द का प्रयोग अनेक स्थानों में किया है जैसा कि:- "प्रनम्य प्रथम मंम आदि देवू । ॐकार

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३ शब्द जिन करि अच्छेव' ॥ चौथे इस तुक में प्रथम मगण होने के कारण तीनों अक्षर दीर्घ होने चाहियेँ, अतएव कवि ने आदी देव ऐसा पाठ कहा है। आदि शब्द संस्कृत में इकारान्त है परंतु उसे कवि ने यहां मगण होने के कारण के अतिरिक्त गानविद्या संबंधी दोष दूर करने के अभि- प्राय से भी ईकारान्त किया है क्योंकि चंद गानविद्या में भी निपुण था और साटक के गाने में तुक की पहिली चौथी मात्रा पर ताल आता है। यद्यपि मेरी कल्पना तौ यह है परंतु जब मैंने इस ग्रंथ का कुछ भाग कोटा राज्य के विद्वान कविराज श्री चंडीदानजी से पढा था तब उनों ने यह बतलाया था कि आदि के पहिले ओ३म् शब्द का प्रयोग कवि चंद ने किया था और उस का अर्थ आदि ओ३म् प्रनम्य अर्थात "पहिले ओंकार को नमन करके" किया था। यद्यपि यह प्रयोग भी कुछ बैठ जाता है और ठीक सा मालूम होता है और जितनी पुस्तकें रासे की मेरे देखने में आईं हैं उन में प्रायः ऐसा ही पाठ मिलता भी है परंतु मैं इस की अपेक्षा मेरी कल्पना को अधिक बलवान और युक्त मानता हूं और आशा करता हूं कि यदि वे अब विद्यमान होते तौ मेरी इस कल्पना को प्रसन्नतापूर्वक मान लेते। यदि कोई ओ३म् आदि प्रनम्य ऐसा भी पाठ मानें तथापि कुछ हानि नहीं है। और जब तक कि किसी बहुत प्राचीन पुस्तक में हमारे इस मानने के विरुद्ध कोई अन्य पाठ न मिल जावे तब तक मैं इस को मानना अयोग्य नहीं समझता हूं ॥ अब दूसरी पंक्ति का पाठ "सिट्टं धारन धारयं वसुमती लच्छीस चरनाश्रयं" है । इस में १२ + ८ = २० अक्षर हैं किं यहां चरनाश्रयं शब्द को मैंने चरणाश्रयं किया है क्योंकि कोई छंद गान से खाली नहीं है और साटक की छांन के अनुसार उच्चारण में यहां रकार स्वर रहित हो जाता है और जैसा उच्चारण और गान में रूप हो वैसा काव्य में लिखने में भी कोई दोष नहीं है । जो कवि गान के नियमों से अपरिचित हैं उन के काव्य में ऐसे स्थलों में अनेक दोष रह जाते हैं क्योंकि गान छंद के लिये एक कसौटी है और ऐसे ही मौकों को कवि का अधिकार अर्थात् Poetical Licence कहते हैं । कोई २ विद्वान कवि के अधिकार की छूट अर्थात् Poetical Licence को दोष मानते हैं परंतु वह एक भ्रम है क्योंकि सस्वर अक्षर का खोड़ा कर देना और खोड़े को सस्वर कर देना व्याकरणादि भिन्न शास्त्रों में दोष समझना चाहिये परंतु छंद रचन और गान में तौ यह दोष नहीं कहाता है देखेः चंद के इन वचनों के भीतरी आशयों से भी हम यही अनुमान कर सक्ते हैं :- लघु गुर मंडित खंडिय हि । पिंगल अमर भरत्थ ॥ ३७ ॥ १ चरन नींम अच्छिर सुरंग । पाट लघु गुरु विधि मंडिय ॥ सुर विकास जारी सु मुष । उक्ति रस गौरब नि छंडिय ॥ ४० ॥ १ तीसरी पंक्ति के पाठ तम गुन तिष्ठति ईस दुष्ट दहनं । सुरनाथ सिद्धिश्चर्यं में १४ + ८ = २२ अक्षर हैं । इस में उपर कही हुई युक्तियों के सिवाय थोड़ा सा और ध्यान देने से ज्ञात हो सक्ता है कि ग्रंथकर्त्ता ने तम गुन और सुरनाथ पाठ नहीं प्रयोग किये थे किन्तु जैसे हम ने अनुमान कर शुद्ध किये हैं तं गुं और सुरनाथ क्योंकि प्रथम तौ इस साटक छंद में मगण होने के कारण तं और गुं ही होने चाहियेँ और दूसरे चंद के ऐसे प्रयोग इस काव्य में बहुत से स्थलों पर दृष्टि आवेंगे । यह भी हमारे देखने में आवेगा कि त्वम् और अहम् के स्थान में तं और हुं जैसे प्रयोग चंद ने किये हैं । इस में हम को कुछ भी आश्चर्य नहीं करना चाहिये क्योंकि चंद के इस नीचे लिखे वाक्य से हम अच्छी तरह समझ सक्ते हैं कि उस ने अपने इस महाकाव्य की भाषा में षट भाषा और कुरान की भाषा का आश्रय किया है:-

४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व श्लोक ॥ उक्ति धर्म विशालस्य । राजनीति नवं रसं । षट भाषा पुराणं च । कुरानं कथितं मया ॥ १ ॥ ३६ अब शेष चौथी पंक्ति का पाठ “थिर चर जंगम जीव चंद नमयं सर्वस वरदा मयं” में १४ + ८ = २२ अक्षर हैं । इस के स्थान में जो यह पाठ “थिर्चजंगम जीव चंद नमयं संर्वस वर्दामयं” शुद्ध किया गया है उस के लिये ऊपर कही हुई युक्तियों से ही हमारा शोधन करना ठीक मालूम हो सक्ता है । इस में इतना कहना और भी आवश्यक है कि सोसाइटी की मुद्रित कियी पुस्तक में जो चंदनमयं पदच्छेद किया है वह अयुक्त है और मिस्टर ऐफ. ऐम. ग्राउज साहब ने जो चंद और नमयं पदच्छेद किये हैं वह ठीक हैं और मैं भी मिस्टर ग्राउज के पदच्छेद से सम्मत हूं ॥ जो पाठ हमने जिस रीति से इस रूपक में शुद्ध किये हैं वह अथवा वैसे ही और भी पाठ जो कहीं आगे इस ग्रंथ भर में आवेंगे तो हम उन पर सर्वत्र टिप्पण नहीं करेंगे किन्तु वहां का मूल पाठ हमारे यहां पर वर्णन किये शोधन प्रकार के अनुसार शुद्ध रहेगा । पाठक महाशय इन ही नियमों से उन पाठों को सिद्ध कर समझ लें अर्थात् जिस नियम को एक स्थान पर टिप्पण में वर्णन कर देंगे वह अन्यत्र नहीं कहा जावेगा । किन्तु जहां कोई नवीन प्रयोग आवेगा वहां उस का वर्णन कर दिखावेंगे ॥ जैसे कि चंद के प्रयोग किये हुए छंदों के नाम और उन के लक्षणों के शोध करने में पुरातत्त्ववेत्ताओं को परिश्रम पड़ता है वैसे ही उस के इस महाकाव्य के अर्थ लगाने में भी अनेक प्रकार की अडचनें उपस्थित होती हैं । यद्यपि हमारा मुख्य काम इस ग्रंथ के मुद्रित करने में केवल इतना ही है कि उस के मूलपाठ को सार्थक शोध दें परंतु यह महाकाव्य वर्तमान समय में ऐसी बिगड़ी हुई दशा में उपस्थित है कि जो उस पर इतना परिश्रम न किया जावे कि जितना हम यह करते हैं तो हमारा किया हुआ शोधन पुरातत्त्ववेत्ता विद्वानों को भली भांति संतुष्ट नहीं कर सक्ता । अतएव हम चंद के काव्य की अर्थ संबन्धी कठिनता को दिखलाने के लिये केवल इस मंगलाचरण के रूपक का अर्थ उदाहरण के लिये करते हैं कि जिस से हमारे पाठकों को मालूम हो कि मूलपाठ का शुद्ध होना अर्थ पर दृष्टि दिये बिना असंभव है । महाकवि चंद अपने इस महाकाव्य के आरंभ में इस मंगलाचरण के रूपक में आदिदेव, गुरु, वाणी, लक्ष्मीश, सुरनाथ और सर्वेश को नमस्कार करता; है वह कहता है कि “आदिदेव को नमन कर के और गुरु को नमस्कार करके; वाणी के पादों को वंदन; स्वर्ग, पाताल, (और) पृथ्वी के सृष्टा लक्ष्मीश के चरणों का आश्रय, दुष्टों के दहन करने को तम गुण (जिस) ईश में रहता है (उस) सुरनाथ की पादुका का सेवन (और) थिर, चर, जंगम, (और) जीव के वरदामय सर्वेश को (मैं) चंद नमन करता हूं” । हमारे किये इस अर्थ को विचारने से विद्वानों को मालूम हो सकेगा कि यद्यपि इस के अनेक प्रकार के अर्थ हो सक्त हैं परंतु यह अर्थ चंद के व्याकरण शास्त्र संबन्धी जो नियम उस के इस ग्रंथ से मालूम होते हैं उनके अनुसार सरल और कवि की उक्ति के अनुकूल है । इस में कितनेक शब्द ऐसे २ भी हैं कि जो अर्थ करने वाले को चमका और भड़का देते हैं परंतु हम इस रूपक के सब शब्दों के विषय में अर्थात् जिसके विषय में जितना कहना आवश्यक है वह कहते हैं :- आदिदेव (सं. पु. आदिदेवः । आदौ दीव्यति स्वयं राजते) नारायण । इस शब्द के विषय में हम ने ऊपर कहा है अतएव यहां विशेष नहीं कहते किन्तु उस के प्रयोग के दो प्रमाण और भी यहां देते हैं:-सहस्त्रात्मा मया योव आदिदेव उदाहृतः॥ या. स्मृ. ॥ वासुदेवो बहृद्दानुरादि देवः पुरंदरः ॥ वि. सहस्रनाम.॥

आदि पर्व ] : पृथ्वौराजरासौ । ५ प्रणम्य (सं० प्रणम्य) नमन करके अथवा प्रणाम कर के ॥ नम्य (सं० अ० नमः अथवा नम्=नमना) नमस्कार कर के इस शब्द के भी म्य पर साटक की ध्वनि के अनुसार ताल है अर्थात् यहां भी स्वर उदात्त है ॥ गुरुयं गुरू को यह चंद की हिन्दी के पुल्लिंग गुरु शब्द की द्वितीया का निज प्रयोग है। चंद के ऐसे निज प्रयोगों को देख कर हम को आश्चर्य के वश न हो जाना चाहिये किन्तु इस बात की खोज करनी चाहिये कि चंद की हिन्दी के व्याकरण संबन्धी नियम क्या और कैसे हैं। और ऐसे अनुस्वार सहित शब्दों को देख कर यह अनुमान भी नहीं करना चाहिये कि रासे का ग्रंथ कर्ता ऐसा निर्बोध था कि उस को अनुस्वार और विसर्ग तक का ज्ञान नहीं था। हमारे यह अन्वेषण ध्यान में लाने योग्य हैं कि प्रथमतः चंद की हिन्दी तीन प्रकार की है पट-भाषा- और-कुरान की-भाषा की-योनिव़ाली १ पट-भाषा-और-कुरान की-भाषा के सम २ और देशी प्रसिद्ध ३। दूसरे संप्रत हिन्दी में तो नपुंसकलिंग नहीं है परंतु चंद की हिन्दी में तीनों लिंग हैं। तीसरे जितनी संज्ञा अनुस्वार सहित उस में प्रयोग हुई हैं वे पुल्लिंग अथवा नपुंसकलिंग ही हैं। देखो यहां नम्य गुरुयं वाक्यखंड में कवि के अर्थ को ध्यान में लाने से गुरुयं शब्द पुल्लिंग में प्रयोग किया गया मालूम होता है और पांचवें रूपक की इस तुक गुरं सब्व कव्वौ लहू चंद कव्वी। जिनैं दर्सियं देवि सा अंग हुव्वी ॥ में गुरं शब्द चंद ने अपनी हिन्दी के नपुंसकलिंग की प्रथमा में प्रयोग किया है। और जहां क्रिया शब्दों में अनुस्वार हैं जैसे इसी प्रमाण में प्रवेश कियी गई तुक में दर्शियं शब्द है वह संस्कृत दर्शितं से है। बहुत से शब्दों पर लेखकों ने अपने अव्युत्पन्न होने के कारण जो अनुस्वार लगा दिये हैं उन का सूक्ष्म विचार करने से विद्वान स्पष्ट जान सक्ते हैं कि यहां कवि ने अनुस्वार का प्रयोग नहीं किया था किन्तु लेखकों ने अपनी अज्ञानता से लगा दिये हैं और कहीं २ उनों ने कवि के प्रयोग किये हुए अनुस्वारों को उड़ा दिये हैं जैसे पांचवें रूपक के भुजंगप्रयात छंद की पहिली तुक में चंद ने ऐसा प्रयोग किया था कि प्रथमं भुजंगी सुधारी यहनं । जिनैं नाम एकं अनेकं कहनं ॥ उस के स्थान में एशियाटिक सोसाईटी की छापी हुई पुस्तक १ के पत्र ३ में देखो कि जिस लिखित पुस्तक से वह छापी गई है उसके लेखक ने प्रथम भुजंगी सुधारी यहनं । जिनै नाम एकं अनेकं कहनं ॥ पाठ कर दिया है। इस के अतिरिक्त चंद के अनुस्वार सहित शब्दों के प्रयोग करने के और भी अनेक कारण हैं परंतु वह जब मेरे संकलन किये हुए चंद के व्याकरण संबन्धी नियम मैं कुछ समय में प्रकाश करूंगा तब स्पष्ट रीति से हमारे पाठकों को मेरे बड़े परिश्रम से सिद्ध किये हुए अन्वेषण मालूम हो जांयगे ॥ वानीय (सं० स्त्री० वाणिः=सरस्वत्याम्) सरस्वती के । यह चंद की हिन्दी में षष्ठी के एकवचन का रूप है और जैसे संस्कृत में श्रीः शब्द के रूप में षष्ठी का श्रियः होता है उसी तरह चंद ने अपनी हिन्दी में वानीय किया है ॥ वंढे-वंदन करता हूं ॥ चेत रखना चाहिये कि हम ऊपर गुरुयं शब्द की व्याख्या में चंद की हिन्दी तीन प्रकार की होना बतला आये हैं उस में से यहां यह वंढे संस्कृत-सम के रूप का प्रयोग चंद ने किया है ॥ पयं (सं० पय = गतौ) चरणों को ॥ यह चंद की हिन्दी के पुल्लिंग की द्वितीया का रूप है। कोई २ कवि जो पय शब्द को पैर का वाचक होना बिलकुल नहीं बताते और उस का अर्थ यहां “दूध जैसो श्वेत अथवा जल जैसी निर्मल सरस्वती को वंदन करता हूं”, करते हैं वह भूल हैं। पय शब्द पैर का वाचक संप्रत हिन्दी में भी रात्रि दिन बोलचाल में आता है जैसे पयलगी,

पैलगी, पालागन पाय और पयदल इत्यादि । और संस्कृत में भी पद्य = गतौ है । मिस्टर ग्राउज साहब ने जो इस शब्द को पैर का वाचक अपने अंग्रजी अनुवाद में माना है वह बहुत ठीक है और मैं उन से इस में सम्मत हूं ॥ सिष्टं (सं० त्रि० सृष्टः = निर्मिते । रचिते) सृजनेवाला । यह चंद की हिन्दी में सं० सृष्ठः सृजनेवाले का नपुंसकलिंग की प्रथमा का एकवचन है । इस को शिष्ठ अथवा श्रेष्ठ आदि शब्दों का अपभ्रंश मानना अयुक्त है किन्तु वह चंद की हिन्दी में सं० त्रि० सृष्टः का सिष्टं बना है इसी तरह सं० भृष्ट, भ्रष्ट, धृष्ट, दृष्ट, के अपभ्रंश रूप हिन्दी में भिष्ट, घिष्ट, दिट्ट, होते हैं ॥ धारणं (सं० पु० धारक = स्वर्लोके) स्वर्गलोक ॥ धारयं (सं० त्रि० धारय = धारके । नाग देशे ॥ धारयैः कुसुमोर्म्मांणाम् । भट्टिः) पाताल लोक ॥ वसुमती (सं० स्त्री० भूलोक । स्पष्टम्) भूलोक ॥ यहां थोड़ा सूक्ष्म विचार कर हमारे किये अर्थ की सत्यता जांचने का काम है क्योंकि सिष्टं धारणं धारयं वसुमती लच्छीस चर्नाश्रयं का अर्थ अनेक कवि अनेक प्रकार का करते हैं परंतु मैं उन को चंद के अभिप्राय के अनुकूल नहीं समझता हूं। इन शब्दों को पृथक् २ अर्थ तो हम ने संस्कृत कोषों से लेकर वर्णन कर ही दिये हैं। इस के सिवाय लच्छीस शब्द जो विष्णु का वाचक है वह हम को यह अर्थ करने की स्पष्ट लक्षणा कराता है कि धारणं = स्वर्गलोक ॥ धारयं = पाताल लोक ॥ और वसुमती = भूलोक का सिष्टं = सृजनेवाला (जो) लच्छीस = विष्णु (उस के) चर्नाश्रयं = चरणों का सेवन (करता हूं) यही बहुत ठीक अर्थ है क्योंकि यहां तत्पुरुष समास है और लच्मीश का अर्थ कोशों में विष्णु का है और विष्णु के विषय में शास्त्रों में नीचे लिखे प्रमाण कहा है उस से भी हमारा किया हुआ अर्थ अच्छी तरह पुष्ट होता है :— यस्मात् विश्वमिदं सर्व्वं । तस्य शक्त्यामहात्मनः । तस्मात् देवोच्यते विष्णु । र्व्विशधातोः प्रवेशनात् ॥ ज्योतींषि विष्णुर्भुवनानि विष्णु । र्व्वनानि विष्णुर्गिरयो दिशश्च । नद्यः समुद्राश्च स एव सर्व्वौ । यदस्ति यन्नास्ति च विप्रवर्येति ॥ अनादि निधनं विष्णुं । सर्व्वलोक महेश्वरं । लोकाध्यक्षं स्तुवं नित्यं । सर्व्व दुःखाति गो भवेत् ॥ ६ ॥ लोकनाथं महद्भूतं । सर्व्वभूत भवोद्भवं ॥ १० ॥ लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृतः कृतः ॥ ३१ ॥ लक्ष्मीवान् समितिं जयः ॥ ५६ ॥ श्रीमाल्लोक त्रयाश्रयः ॥ ८२ ॥ त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः । केशवः कैशिहा हरिः ॥ ८६ ॥ लोकस्वामी त्रिलोक धृत् ॥ ८७ ॥ लोकाधिष्ठानमद्भूतः ॥ ११२ ॥ त्रीन् लोकान् व्याप्यं भूतात्मा । भुंक्ते विश्व भुगव्ययः ॥ १४४ ॥ वासनाद्वासुदेवस्य । वासितं भुवन त्रयं ॥ १५१ ॥ चर्णाश्रयं (सं० चरण + चाश्रयं = ) चरणों का सेवन ॥ यह अनुस्वार सहित शब्द भी चंद की हिन्दी का संस्कृत - सम नपुंसकलिंग है ॥ सं । गुं (सं० न० तमः और पु० गुणः) तम । गुण । चंद को हिन्दी के नपुंसकलिंग ॥ प्राकृत-भाषा सम का प्रयोग ॥

[आदि पर्व] पृथ्वीराजरासौ । ७

तिष्ठति (सं० तिष्ठति) रहता है । चंद की हिन्दी के संस्कृत-समभेद का रूप है ॥ ईसं-(सं० पु० ईशः = महादेवे) महादेव । सदाशिव ॥ दुष्ट (सं० न० दुष्टं = अधमे । वंचके) दुष्टं ॥ दुष्ट दहनं = दुष्टों के दहन करने के लिये अथवा दुष्टों के दहनार्थ ॥ दहनं (सं० पु० दहनः = दाहे । भस्मी करणे ।) दहन के लिये चंद की हिन्दी का नपुं० है ॥ सुर्नाथ (सं० पु० सुर + नाथ = रुद्रे) महादेव की ॥ सिद्धि (सं० स्त्रो० सिद्धिः = पादुकांयाम्) पादुका का ॥ अयं (सं० पु० अयः = अयणे । आये ॥ श्रिञ् = सेवायाम्) सेवनं ॥ सिद्धि अयं = पादुका का सेवन ॥ थिर (सं० पु० स्थिरः = स्थिर पदार्थेः) स्थिर वस्तु जैसे:- पर्वत और पृथ्वी आदि ॥ चर (सं० पु० चरः = चले) चर वस्तु अथवा पदार्थ जैसे वस्तु और जलादि ॥ जंगम (सं० त्रि० जंगमः = पशुपत्ती) कीट पतंगादि ॥ जीव (सं० पु० जीवः = प्राणिनि) मनुष्यादि ॥ ध्यान में लेने की बात है कि पंडितों ने सब पदार्थों को स्थावर और जंगम नामक दो भेदों में ही विशेष करके विभक्त किये हैं । परंतु चंद ने सब पदार्थों के चार भेद माने हैं । प्रथम स्थिर, जो सदैव स्थिर रहते हैं, जैसे पर्वतादि; दूसरे चर, जो सदैव स्थिर नहीं रहते, जैसे स्थानादि; तीसरे जंगम, जो जीव दूध नहीं पीते, जैसे कीट पतंगादि; और चौथे जीव, जो दूध पीते हैं, जैसे मनुष्यादि । हम ने किसी २ कवि को इन चारों शब्दों के प्रयोग करने के कारण चंद कवि को दोष देते हुए सुने हैं परंतु यह उनको भूल है, क्योंकि उन्होंने कवि के सूक्ष्म आशय को ध्यान देकर नहीं समझा है ॥ चंद वरदई=इस महाकाव्य का ग्रंथ-कर्त्ता कि जो हिन्दुओं के अंतिम बादशाह पृथ्वीराज जी चौहान का लंगोटिया मित्र और उन के दरबार का कविराज था । वह भट्ट जाति जो आज कल राव करके कहलाते हैं उस के जगत नामक गोत्र का था और उस के पूर्व पंजाब देश के लाहौर नगर के रहने वाले थे और उन की यजमानी अजमेर के चौहानों की थी । उस की जैसी शूरवीरता इस महाकाव्य से विदित होती है उस का मुख्य कारण यहो है कि वह पंजाब देश की अद्यावधि प्रसिद्ध वीर भूमि के तत्त्वों से उत्पन्न हुआ था और राजपूताने के हृदयरूपी अजमेर नगर में बड़ा हुआ था । वह षट-भाषा, व्याकरण, काव्य, साहित्य, छंद शास्त्र, ज्योतिष, वैद्यक, मंत्रशास्त्र, पुराण, नाटक, और गान आदिक विद्याओं में अच्छा व्युत्पन्न पंडित था । उस के पिता का नाम वेण और विद्या-गुरु का नाम गुरुप्रसाद था । उस की दो स्त्रियों के नाम कमला अर्थात् मेवा और गौरी अर्थात् राजोरा और एक लड़की का नाम राज बाई और दश लडकों के नाम सूर १ सुन्दर २ सुजान ३ जल्ह ४ बल्ह ५ बलिभद्र ६ केहरि ७ बीरचंद ८ अवधूत अर्थात् योगराज ९ और गुनराज १० थे । इस महाकाव्य के विषयों को वैसे तो उस ने समय २ पर बना कर कंठ कर रक्खे थे परंतु उन को ग्रंथाकार में उस ने ६०॥ दिन में रचा था और अंत को उस ने रासे की पुस्तक अपने लड़के जल्ह नामक को दियो थी । इस रासे के अतिरिक्त उस के रचे और भी कई एक ग्रंथ सुनने में आते हैं परंतु उन में सब से बड़ा ग्रंथ यह रासा है और अन्य सब ग्रंथ अब विल्कुल्ल नहीं मिलते हैं । उस का सविस्तर जीवनचरित्र और वंशावली जहां तक हमारे जानने में ख्यातादि से आई है वह हम इस ग्रंथ के समाप्त होने पर छाप कर प्रसिद्ध करेंगे ॥

[आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ६ ॥ कर्म्म-स्तुति ॥ कवित्त ॥ प्रथम मंगल्ल प्रमान । निगम संपजय वेद धुर ॥ त्रिगुन साख चिहुँ चक्र । वरन लग्गो सु पत्त कर ॥ त्वचा भ्रम्म उड्डरिय । सत्त फूल्यो चावहिसि ॥ क्रम्म सुफल उदयत्त । अमृत सुम्रत मध्य वसि ॥ डुलै न वाय नृप नीति अति । खाद अमृत जीवन करिय ॥ कलि जाय न लगै कलंक इहि । सत्ति मत्ति आठति धरिय ॥ कं० ॥ ३ ॥ रू० ॥ ३ ॥ इस छंद की प्रथम तुक की प्रथम यति के प्रथम टुकड़े में बीय पाठ अशुद्ध है उस के स्थान में हम ने बिय किया है । और दूसरी यति के दूसरे टुकड़े में सिंचियइ के स्थान में सिंचिय और धम्मं के स्थान में धम्म और यत के स्थान में पत्त, बारहै को बारह, और परस को पारस शुद्ध किये हैं और यह शोधन ऐसे साधारण हैं कि जिनके लिये कोई तर्क लिखने की आवश्यकता नहीं है ॥ इस रूपक में ग्रंथकर्त्ता वृत्त के रूपकानकार से धर्म की स्तुति करता है ॥ ३ कवि ने इस रूपक के छंद को कवित्त संज्ञा दियो है । संप्रत काल में यह छप्पय, छप्पै, षट- पद, षटपदी आदिक नामों से प्रसिद्ध है परंतु सत्रहवीं शताब्दी के पहिले वह कवित्त नाम से ही प्रसिद्ध था । रूपदीप पिंगल वाले ने भी जो नीचे लिखा छप्पय का लक्षण कहा है उस में उस ने भी यह कहा है कि:-“सुन गरुड पंख पिंगल कहैं । छप्पे छंद कवित्त यह” इस से सिद्ध होता है कि इस ग्रंथ के बनने के समय तक छप्पै का नामान्तर कवित्त करके प्रसिद्ध था ॥ छप्पै लक्षण । लघु दीरघ नहि नेम । मत्त चौबीस करीजै ॥ ऐसे ही तुक सार । धार तुक चार भरीजै ॥ नाम रसावल होय । और वस्तु कभि जानहु ॥ उल्लाला की विरत । फेर तिथ तेरह आनहु ॥ द्वै तुक बनावो अंत की । यत यत में अठ बीस गहु ॥ सुन गरुड़ पंख पिंगल कहै । छप्पै छंद कवित यह ॥ इस के अतिरिक्त मंच्छ कवि कृत रघुनाथ रूपक में भी उस ने छप्पै छंदों को कवित्त कर के ही लिखे हैं ॥ इस के पाठ को शोधन करने में ध्यान में लेने जैसी बात है कि प्रथम और मंगल शब्दों के बीच में जो बहुत सी पुस्तकों में किय शब्द है वह अधिक होने से अशुद्ध है क्योंकि उस पाद में कुल्ल ११ मात्रा होनी चाहियें । बेदले वाली पुस्तक में संपजय शब्द है और एशियाटिक सोसाइटी की छापी हुई पुस्तक में तो संपूर्जय किया गया है-इस में मेरी सम्मति यह है कि पाठ में तो संपजय ही रखना चाहिये परंतु अर्थ करने में संपूर्जय समझना चाहिये-क्योंकि संपूर्जय पाठ रखने

५० . पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व मुक्ति-स्तुति । कवित्त ॥ भुगति भूमि किय क्यार । वेद सिंचिय जल पूरन ॥ बीय सुबय लय मध्य । ग्यांन अंकू रस जूरनं ॥ चिगुन साख संगहिय । नाम बहु पत्त रत्त क्खिति ॥ सुक्रम सुमन फुल्ल्यै । सुगति पक्की द्रव संगति ॥ दुज सुमन उसिय बुध पक्क रस । वट विस्वास गुन पस्तंरिय ॥ तरु इक्कसाख चय लोक मद्धि । अजय विजय गुन विस्तरिय ॥ कं० ॥ ४ ॥ रु० ॥ ४ ॥ पूर्व कवियों की स्तुति और उच्छिष्ट संज्ञा कथन ॥ ॥ भुजंगप्रयात ॥ प्रथमं भुजंगी सुधारी ग्रहंनं । जिनें नाम एकं अनेकं कहंनं ॥ से छंद टूटता है । गुजराती भाषा में ऐसे शब्द बहुत आते हैं जैसे मुकुन्दराम का मक्रन्दराम, तुलसी का तलशी, और शिव का शव । ऐसे मुख दोष के कारण से बिगड़े हुए शब्दों के रूपों के लिये एक यह श्लोक भी प्रसिद्ध है :- गुर्जरा मुख दोषेण । शिवोपि शवतां गताः ॥ तुलसी तलशी जाता । मुकुन्दोपि मक्रन्दतां ॥ इस के अतिरिक्त चंद की हिन्दी में ऐसे प्रयोग बहुत से आवेंगे जैसे "विन्दलालाट प्रसेद कियो" यहां प्रस्वेद का प्रसेद हुआ है । चिहुं के स्थान में चिहुँ किया है क्योंकि यहां अर्ध अनुस्वार प्राप्त है । लगे के स्थान में लग्गो, उद्यत के स्थान में उदयत्त । लागे के स्थान में लगे । और सति मति के स्थान में सत्ति मत्ति सुधारे हैं क्योंकि ऐसे पाठ सुधारने को छंद के टूटने का दोष हम को स्वयम् सचेत करता है ॥ इस रूपक में भी चंद कवि रूपकालंकार से कर्म की स्तुति करता है ॥ ४ इस के पाठ में एशियाटिक सोसाइटी आदि की पुस्तकों में जो अंकूर और सजूरन पाठ हैं वह एक बालक भी जान सक्ता है कि बड़े ही अशुद्ध हैं किन्तु दृष्टि देने से हमारे किये पदच्छेद से सार्थक पाठ हो जाते हैं अर्थात् अंकू रस जूरन । हम ने रत के स्थान में रत्त क्खित्ति के स्थान में क्षिति पाठ किये हैं । हमारे उसिय पाठ के स्थान में आगरा कालेज और बेदले आदि की पुस्तकों में असिय पाठ है परंतु वह अशुद्ध है । मालूम होता है कि उन के लेखकों ने उ को ऐसा ऊ समझ कर अशुद्ध पाठ लिख दिया है और अर्थ पर दृष्टि देकर प्रति नहीं कियी है ॥ स्मरण में रखना चाहिये कि इस रूपक में कवि रूपकालंकार से मुक्ति की स्तुति करता है । अर्थात् चंद ने दूसरे तीसरे और इस चौथे रूपकों में क्रम से धम्मेश्वर, कम्मेँश्वर, और मुक्तेश्वर नामक ईश्वरों के मंगलाचरण किये हैं ॥ ५ इस भुजंगप्रयात नामक छंद का लक्षण चंद कवि के माने हुए छंद ग्रंथों में से पिंगल मुनि

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ११ दुती लम्भयं देवनं जीवतेसं । जिनैं विश्व राख्यो बली मंच सेसं ॥ चवं वेद बंभं हरी कित्ति भाखी । जिनैं ध्रम्म साधम्म संसार साखी ॥ तृती भारती व्यास भारत्य भाख्यौ । जिनैं उत्त पारत्थं सारत्थ साख्यौ ॥ चवं सुखदेवं परीखत्त पायं । जिनैं उड्डयौ अ्रब्ब कुवेंस रायं ॥ नरं रूप पंचम्म श्रीहर्ष सारं । नलैराय कंठं दिने पल्ल धारं ॥ षटं कालिदासं सुभाखा सुबद्धं । जिनैं बागवानी सुबानी सुबद्धं ॥ कियो कालिका मुख वासं सुसुद्धां । जिनैं सेत बंध्योति भोज प्रबंधं ॥ सतं डंडमाली उछाली कविंत्तं । जिमैं बुद्धि तारंग गंगा सरित्तं ॥ जयदेव अ्ठं कवी कब्बिरायं । जिनैं केवलं कित्ति गोविंद गायं ॥ गुरं सब्ब कब्बीं लहू चंद कब्बी । जिनैं दर्सियं देवि सा अंग छब्बी ॥ कवी कित्ति कित्ती उकत्ती सुदिक्खी । तिनैं की उच्छिष्टी कवी चंद भक्खी ॥ , कूं० ॥ १० ॥ रू० ॥ ५ ॥ यह लिखते हैं कि “भुजंग प्रयातं यः ॥ ३८ ॥ अर्थात् जिस के पाद में चार यकार (यगण) हों वह भुजंगप्रयात नामक छंद कहाता है ॥ इस पांचवें रूपक के जो पाठ एशियाटिक सोसाईटी की और अन्य पुस्तकों में बहुत अशुद्ध हैं वह यह हैं:- प्रथम । यहनं । कहनं । लम्भयं । भारथं । उतपारथ । सारथ । सुखदेवं । परीक्षंत । उट्टयौ अब्र । कुरुवंस । पल्ल । कालिदास । मुख्य । सुसुद्ध । वंध्यौ । तिभोजन । बुद्धितारंग । गंगासरित्तं । जयदेवं । अठं । केवलं । दरसिय । उकति । तिन । कवि । और भष्थी । इन में से प्रत्येक को सिद्ध करने के लिये जो हम सतर्क विवेचना करें तौ बहुत स्थान चाहिये परंतु मैं आशा करता हूं कि पुरातत्त्ववेत्ता इन को हमारे शुद्ध पाठों से मिलाकर और जो कुछ चंद कवि की हिन्दी के नियम हम ने संक्षेप में पहिले प्रकाश किये हैं उन से विचार कर सिद्ध कर लेंगे । इस रूपक में चंद कवि अपने से पहिले हुए मुख्य २ कवियों की स्तुति करके अंत की दो तुकों में उन को अपने गुरु मान कर और आप निरभिमानी होकर अपने काव्य को उनके कहे काव्य की उच्छिष्टी होने की संज्ञा देता है । जैसे कि इस महाकाव्य के किसी २ रूपक में चंद के समय के पीछे वरते हुए वृत्त लिखे प्राप्त होते हैं और उन पर से इस ग्रंथ की प्रामाणिकता में संदेह किया जाता है वैसे ही यह रूपक क्या इस ग्रंथ की प्रामाणिकता के सिद्ध करनेवाला एक प्रमाण रूप नहीं है? और अन्य कवि जैसे श्रीहर्ष और जयदेवादि के समय के निश्चय और निर्णय करने में पुरातत्त्ववेत्ताओं का सहायक और उपकारी नहीं हो सक्ता है ? इस के अतिरिक्त इस छंद की तीसरी तुक में जो एक बंभ शब्द चंद कवि ने प्रयोग किया है उस को देख कर चारण राव और भाट जाति के अच्छे २ कवियों को हम ने आश्चर्य करते हुए देखे हैं और वे इस का अर्थ अंड बंड करते हैं । कोई उस को ब्रह्म शब्द का अपभ्रंश बतलाते हैं और कोई चारों वेदों के ब्राह्मण ग्रंथों का वाचक बतलाते हैं और कोई कहते हैं कि महादेव की मूर्ति के आगे जो गाल बजा के बंब शब्द मुख से करते हैं और ऐसा करने से महादेव प्रसन्न हो

१२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ चंद की स्त्री अपने पति के उच्छिष्ट संज्ञा कथन से शंका करती है ॥ दूहा ॥ उच्छिष्ट चंद छंदह बयन । सुनत सु जंपिय नारि ॥ तनु पवित्र पावन कविय । ऊकति अनूठ उधारि ॥ छं० ॥ ११ ॥ रू० ॥ ६ ॥ कवित्त ॥ कहै कंति सम कंत । तंत पावन बड़ कब्बिय ॥ तंत संत उच्चार । देवि दरसिय मक्खि छब्बिय ॥ जाते हैं उस का वाचक है परंतु इस शब्द का हम पता लगाकर बताते हैं कि यह बंभं चंद की हिन्दी का भूतकालिक क्रियावाचक शब्द है और संस्कृत भाषा में यङ्लुगन्तप्रक्रिया के प्रयोगों में जो बंभणीत नर्भति प्रयोग सिद्ध होता है उस से बना है और उस का यहां फिर २ वा बार २ पढ़ा वा भणा का अर्थ है । क्योंकि "चवं वेद बंभं हरी कित्ति भाखी" इस तुक का अर्थ यह है कि जिस "जीवतेस ने चारों वेदों को बार २ पढ़े वा भणे और हरी की कीर्ति को भाखी"। जो मनुष्य संस्कृत भाषा में अच्छा व्युत्पन्न और पक्षपात और हठ जैसे दोषों से विमुक्त और सत्य का दृढ़ अवलंबन करनेवाला है वह मैं आशा करता हूं कि ऐसे प्रयोगों को देख कर कदापि यह नहीं कहैगा कि इस महाकाव्य का ग्रंथकर्त्ता चंद संस्कृत भाषा में अव्युत्पन्न था ॥ इस रूपक में चंद कवि आठ कवियों को अपने गुरु मान कर उन की स्तुति और उन की काव्य रचना-शक्ति का वर्णन करता है वह सब से पहिले भुजंगी नाम से परमेश्वर को कवि ग्रहण करता है क्योंकि वेदादिक में उस का कवि नाम कहा है यथा:- "होता वा देव्या कवी०" यजुः "प्रथम वरजं भेषजं कविम्०" यजुः "कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूः०" ईशोपनिषत् "कविः क्रान्तदर्शी सर्वदृक् नान्यतोऽस्ति द्रष्टा" स्मृतिः ॥ शा० भा० "कवि पुराणमनुशासितारम्०" गीता ॥ दूसरे जीवतेश से प्राणनाथ अर्थात् ब्रह्मा कि जो आदि कवि कहाता है जैसे भागवत में कहा है कि "तेने ब्रह्महृदा य आदि कविये मुह्यन्ति यत् सूरय" बाकी सब कवियों के विषय में कुछ विशेष कहने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि सर्व साधारण लोग व्यासादि के नाम से भले प्रकार ज्ञात हैं ॥ ६-९-कवि चंद ने जो पहिले रूपक में अपने काव्य को अपने से पहिले हुए कवियों के काव्य का उच्छिष्ट होना कहा है उसे सुन कर उस की स्त्री उच्छिष्ट संज्ञा में आश्चर्य के साथ शंका और अपने पति के गुणों का वर्णन करती है अर्थात् इन रूपकों में कवि चंद ने अपनी स्त्री के प्रश्नोत्तर के प्रसंग से अपने काव्य की उच्छिष्ट संज्ञा के हेतु और अपने गुण प्रकाश किये हैं। इन में सम, कंति और कंत शब्दों के प्रयोग विद्वानों की दृष्टि में रहने योग्य हैं। सम (सं० अ० सम् = संगे, - सम्बन्धे, समुच्चये,) को अथवा प्रति, और सम ब्रह्मरूप में सम शब्द तुल्य के अर्थ में कवि ने प्रयोग किया है; कंति (सं० स्त्री० कम् = ति) पत्नी अथवा स्त्री, और कंत (सं० पु० कम् + त) पुरुष अथवा

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १३ तंत बीर उग्रंत । रंग राजन सुख दाइय ॥ बाल केल प्रत्यंग । सुरनि उड्ढरि कविताइय ॥ अवलंब उकति उच्चार करि । जिचित्त सोच्चि कोविद् रचै ॥ सम ब्रह्मरूप या सबद कहुँ । क्यों उच्छिष्ट कवियन कथै ॥ कूं० ॥ १२ ॥ रू० ॥ ७ ॥ ॥ चंद अपनी स्त्री की शंका का समाधान करता है ॥ कवित्त ॥ सम बनिता वर बंदि । चंद जंपिय कोमन्न कन्न ॥ सबद् ब्रह्म इह सत्ति । अपर पावन कंचि निर्मल ॥ जिह्वित सबद् नहिं रूप । रेख आकार व्रन्न नहिँ ॥ अलख अगाध अपार । पार पावन चयपुर महिँ ॥ तिहिँ सबद् ब्रह्म रचना करौं । गुरु प्रसाद सरसैं प्रसन ॥ जयपि सु उकति चूकौं जुगति । तौ कमल वदनि कवित्त हँसन ॥ कुं ॥ १३ ॥ रू० ॥ ८ ॥ ॥ चंद की स्त्री पुनश्च शंका करती है ॥ कवित्त ॥ तुम वानी बरबंद । नाग देखंत विमल मति ॥ छंद भंग गन रचित । कंठ कौमार काव्य कृत ॥ पति, यह तीनों चंद की हिन्दी के संस्कृत - सम प्रयोग हैं । और तंत और मंत शब्दों के प्रयोग भी दृष्टि देने जैसे हैं तंत पावन में तंत = तत्व और तंत मंत में तंत = तंत्र और मंत = मंत्र के वाचक कवि ने प्रयोग किये हैं ॥ अन्य पुस्तकों में यह अशुद्ध पाठ हैं :- सु, जंपिय, कवि, सुख, दाईय, कविताईय, को, विद, समब्रह्मरूप, कहुं, कविय और न ॥ ८ चंद इस रूपक में अपनी स्त्री को उस की शंका का उत्तर देकर समाधान करता है । शब्दब्रह्म (सं० शब्दात्मकं ब्रह्म) शब्द का प्रयोग चंद की व्याकरण और वेदान्त विद्या के ज्ञान का द्योतक है । गुरुप्रसाद शब्द यहां श्लेषार्थ में कवि ने प्रयोग किया है क्योंकि ख्यातियों के अनुसार चंद के विद्या-गुरु का नाम गुरुप्रसाद था । यद्यपि कुछ विशेष वृत्त नहीं मिलते तथापि यह गुरुप्रसाद नामक पंजाब देश का रहनेवाला एक बड़ा पंडित हुआ है । कवित्तह चंद की हिन्दी का निज प्रयोग है और उस का अर्थ कवित्त अर्थात् काव्य रचनेवाले कवि का है । किसी २ पुस्तक में जो वरबंदि, अमल, अबल, चयपूर, महि, तिहि, और प्रसव पाठ हैं वे अशुद्ध हैं ॥ ९ जिन पुस्तकों में यह पाठ हैं:- अभीय, सुनर, और समलहहि, वह अशुद्ध हैं इस में दूसरी तुक का दूसरा पाद "कंठ कौमार काव्य कृत" विद्वानों के ध्यान देने जैसा है । इस का आशय यह

१४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व बुधि तरंग सम गंग । उकति उच्चार अमिय कल ॥ सुरन सुनत विहसंत । संत जनु वश्य करन बल ॥ अवतार भूप पृथिराज पहु । राज सुख तिन सम लच्छि ॥ बीराधि बीर सामंत सब । तिन सु गल्ह अच्छी कच्छि ॥ छं० ॥ १४ ॥ रू० ॥ ९ ॥ ॥ चंद अपनी स्त्री की शंका का पुनश्च समाधान करता है ॥ कवित्त ॥ गज़ गवनी प्रति चंद । छंद कोमल उच्चारिय ॥ मनहरनी रस बेलि । सुरन सागर रस धारिय ॥ बंक नयन बय बाल । प्रान वल्लभ सुखदाइय ॥ अशुन निगुन गुरु अवनि । गवरि पूजा फल पाइय ॥ भए आदि अंत कविता जिते । तिन अनंत गति मति कछिय ॥ अनेक ग्रंथ तिन बरनवत । यौं उचिष्ट मति मैं लछिय ॥ छं० ॥ १५ ॥ रू० ॥ १० ॥ ॥ चंद अपनी स्त्री के आगे ईश्वर के ऐश्वर्य का वर्णन करता है ॥ ॥ पद्धरी ॥ प्रनम्म प्रथम मम आदिदेव । ॐकार सब्द जिन करि अकेव ॥ निरकार मध्य साकार कीन । मनसा विलास सच फल फलीन ॥ १६ ॥ चयगुनह तेज चयपुर निवास । सुर सुरग भूमि नर नाग भास ॥ पुनि ब्रह्मरूप ब्रह्मा उचारि । कथि चतुरवेद प्रभु तत्त सारि ॥ १७ ॥ है कि चंद की स्त्री अपने पति से कहती है कि तुम कंठ कौमार काव्य कृत हो अर्थात् तुम को कौमार काव्य कंठ है। क्या यह भी चंद के संस्कृत भाषा में व्युत्पन्न होने का एक अच्छा प्रमाण नहीं है? १० अन्य पुस्तकों में यह पाठ अशुद्ध हैं बेली, सुखदाईय, जितै, बरन, बत और मैं। इस रूपक में गवरि शब्द श्लेषार्थ में कवि ने प्रयोग किया है क्योंकि ख्यातियों में चंद की स्त्री का नाम गौरी करके प्रसिद्ध है ॥ ११ इस रूपक के छंद का नाम पद्धरी है और उस का लक्षण यह है:- दस करो प्रथम फिर षट मिलाय । गिन षोडश मत्ता पाय पाय ॥ इक जगन अंत में धरत सोय । भनि शेष पद्धरी छंद होय ॥ रू० दी० ॥ इस रूपक में चंद अपनी स्त्री को ईश्वर का ऐश्वर्य वर्णन कर बताता है और पहिली तुक में प्रनस्य पाठ नहीं ग्रहण करना चाहिये किन्तु प्रनम्म पाठ ठीक है अर्थात् चंद अपनी स्त्री को

१६ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ चंद की स्त्री अपने पति से अष्टादश पुराणों की अनुक्रमणिका पूछती है ॥ दूहा ॥ सुनत काव्य कवि चंद कौ । चित आनन्दी नारि ॥ तुम वानी बानी प्रसन । हसन हुवंत निवारि ॥ छं० ॥ २९ ॥ रु० ॥ १२ ॥ कवित्त ॥ कहै कंति मतिवंत । तंत रसना रस सागर ॥ तुम गुन श्रवन सुहंत । जानि चमकंत कलाधर ॥ तुम देवी वरदान । दान दीजै मुहि कब्बिय ॥ अष्टादसच पुरान । नाम परिसानह सब्बिय ॥ तुम कथत कथन आनन्द मुहि । अग्ग पच्छ भव सुद्धरै ॥ अग्यान तिमर नट्ठय सुनत । अध्य कमन्न चिय उड्डरै ॥ छं० ॥ ३० ॥ रु० ॥ १३ ॥ ॥ चंद अष्टादश पुराणों की अनुक्रमणिका का कथन करता है ॥ पद्धरी ॥ ब्रह्मान्यदेव सम वासुदेव । अष्टदस पुरान तिन कहि सुभेव ॥ तिन कहैं नाम परिमान बन्न । जिन्न सुनत सुद्ध भव होत तन्न ॥ ३१ ॥ ब्रह्मच पुरान दस सहस जुद्दि । जिद्दि पढ़न सुनत तन तप्प छुद्दि ॥ पञ्चास पंच हजार गन्नि । पद्मच पुरान तिन कह्यौ बन्नि ॥ ३२ ॥ तेतीस सहस सैं चारि जानि । विष्णू पुरान विष्णू समानि ॥ साहब ने जो अरबी صبر सब्र शब्द होना अनुमान किया है वह अयुक्त है क्योंकि अरबी صبر सब्र शब्द का अर्थ यहां सर्वरीत्या अघटित है किन्तु मानना चाहिये कि चंद ने हिन्दी सवरि शब्द का छंद टूटने के कारण सबरि प्रयोग किया है और रासे की किसी २ पुस्तक में ऐसा पाठ भी मिलता है । जो इस शब्द को रकार और बकार के उलट पुलट लिखे जाने से सरब शब्द होना भी हम माने तथापि यह कुछ असंगत नहीं है ॥ १२ इस में प्रसन्न शब्द का पाठ किसी २ पुस्तक में मिलता है परंतु यहां छंद टूटने के कारण कवि ने प्रसन करके प्रयोग किया है ॥ १३ इस कवित्त के भिन्न २ पुस्तकों में जो यह पाठ मिलते हैं वे अयुक्त हैं जैसे:-कहे, वर, दानि, पक्कू, नट्ठ, य, अंध्रक, और मल ॥ १४ इस रूपक के अशुद्ध पाठान्तर अन्य पुस्तकों में यह हैं:- अष्टादस, कहै, सभेव, बन्हिहो, तवनि, तप्प, पंचास, पंचह, च्यारि, तिष्ण, अठार, भागवंत, तहां, तेईस, दुख, संपूर्, अग्नि, पठि इग्यार, अच्छ, पछ, कूरभ, मन्छ, भक्ति, डरांन, सहंस, और नंस ॥ इस रूपक के ४१ वें छंद की एक तुक भाषा के कवि घटती बता कर चंद पर दोषा- रोपण करते हैं परंतु यह उन की भूल है क्योंकि चंद ने इस छंद को एक ही तुक में कहा है

१८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ गाहा ॥ पय सव्वरी सुभत्तौ । एकंत्तौ कनय राय सोयंसी ॥ कर कंसी गुज्जरीय । रव्वरियं नैव जीवंति ॥ छं० ॥ ४३ ॥ रु० ॥ १६ ॥ सत्त खनै आवासं । मच्चिलानं मह सह नूपरया ॥ सतफल बज्जुज पयसा । पब्बरियं नैव चाखंति ॥ छं० ॥ ४४ ॥ रु० ॥ १७ ॥ रब्बरियं रस संदं । क्यूं पुज्जति साध अमियेन ॥ उकति जुगत्तिय ग्रंथं । नथिकत्थ कवि कत्थिय तेन ॥ छं० ॥ ४५ ॥ रु० ॥ १८ ॥ याते वसंत मासे । कोकिल झंकार अंब वन करयं ॥ बर बब्बूर विरषं । कपोतयं नैव कलयंति ॥ छं० ॥ ४६ ॥ रु० ॥ १९ ॥ सहसं किरन सुआज । उगि आदित्य गमय अंधारं ॥ खद्यं उमा न सारो । षोडसयं नैव खलकंति ॥ छं० ॥ ४७ ॥ रु० ॥ २० ॥ कज्जल मद्धि कस्तूरी । रानी रेहंत नयन श्रंगारं ॥ कां मसि घसि कुंभारी । किं नयने नैव अंजंति ॥ छं० ॥ ४८ ॥ रु० ॥ २१ ॥ ईस सीस असमानं । सुर सुरी सलिल तिष्ट नित्यनं ॥ पुनि गलत्ती पूजारा । गडुवा नैव ढालंति ॥ छं० ॥ ४९ ॥ रु० ॥ २२ ॥ १६–२२ गाहा छंद का लक्षण यह है :— गाहा पहिले बारह । दूजै अठारहै कला राजै ॥ तीजै बारह धारहु । पंद्रह चौथे तहां छाजै ॥ इन गाहा छंदों में अशुद्ध पाठान्तर यह हैं :— सनफल, क्यूपने, बंबू, रवि, रब्धं, नतय, सुरीस, लिल, और फुनि ॥ बाईसमें गाहा के “ईस सीस असमानं” में जो असमानं शब्द है उस को जो मिस्टर जोन बीम्स साहब फारसी आसमान آسمان होना अनुमान करते हैं उस से मैं बिलकुल असममत् हूं । मैं इस को सं० असमानं, त्रि० (नास्ति समानो यस्य ।) अतुल्यं, विजातीयं, सजातीयाभिचं, का वाचक समझता हूं अर्थात् ईस = परमेश्वर का; सीस = शिर; असमानं = अतुल्य है ।

१. पृथ्वीराज का जन्म एवं बाल-चरित्र

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १६ ॥ चंद उत्तापित होकर अपने को पूर्व-कवियों का दास होना, उन की उक्ति को कहना और अपनी को बकना कहता है ॥ ॥ दूहा ॥ कहां लगि लघुता वरनवौं । कविन दास कवि चंद ॥ उन कत्थि ते जो उब्बरी । सो बकहहिं करि छंद ॥ छं० ॥ ५० ॥ रू० ॥ २३ ॥ ॥ चंद खलों का स्वभाव वर्णन कर के सुजनों के निमित्त अपना काव्य रचन करना कहता है ॥ ॥ दूहा ॥ सरस काव्य रचना रचौं । खल जन सुनि न हसंत ॥ जैसे सिंधुर देखि मग । स्वान सुभाव भुसंत ॥ छं० ॥ ५१ ॥ रू० ॥ २४ ॥ तौ पनि सुजन निमित्त गुन । रचिये तन मन फूल ॥ जूका भय जिय जानिकैं । क्यों डारिये दुकूल ॥ छं० ॥ ५२ ॥ रू० ॥ २५ ॥ ॥ सरस्वती की स्तुति ॥ ॥ साटक ॥ मुक्ताचार विचार सार सुबुधा, अबुधा बुधा गोपनी ॥ स्वेतं चीर सरीर नीर गहिरा, गौरी गिरा जोगनी ॥ बीना पानि सुवानि जानि दधिजा, हंसा रसा आसिनी ॥ लंबोजा चिहुरार भार जघना, विग्ना घना नासिनी ॥ छं० ॥ ५३ ॥ रू० ॥ २६ ॥ ॥ गणेश की स्तुति ॥ कचंजा मद गंध राग रुचयं । अलिभूराच्छादिता ॥ गुंजा चार अधार सार गुनजा, झंझा पथा भासिता ॥ अग्रेजा श्रुति कुंडलं करि कर, खुहीर उद्धारयं ॥ सोयं पातु गनेस खेस सफलं, पृथाज काव्यं कृतं ॥ छं० ॥ ५४ ॥ रू० ॥ २७ ॥ २३-२५ इन में जो किसी २ पुस्तक में तेनो पाठ है वह अशुद्ध है । कवि चंद ने अपनी लघुता वर्णन करते २ अंत को उत्तापित होकर जो यह दो दोहे ( २४ ॥ ५२ ॥ + २५ ॥ ५३) कहे हैं वह इस महाकाव्य के पाठकों और खंडन करने वालों को ध्यान में रहने योग्य हैं ॥ २६-२७ इन रूपकों में यह अशुद्ध पाठान्तर हैं:- गोपनी, गिराजोगनी, सुवानी, दधि, जाहं,

२० पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ गणपति की उत्पत्ति की कथा ॥ विराज ॥ रतं रत्त भारी । करुना बिचारी ॥ खियौ मात नक्खं । बियो संख लक्खं ॥ ५५ ॥ मिले एक दीहं । रमै काम सीहं ॥ इकं रिषि आयौ । दियौ काम चायौ ॥ ५६ ॥ खिज्यौ रिषि भारी । दियौ काम डारी ॥ भयौ पुच तब्बं । धजा मोद सब्बं ॥ ५७ ॥ सिरो माझधारी । गनेसं बिचारी ॥ खिजे तब्ब ईसं । भयौ रोम बीसं ॥ ५८ ॥ अबल्ला इकल्ली । वियौ पुर्ष झिल्ली ॥ उके डोर नहं । छन्यौ पुच बहं ॥ ५९ ॥ खिजी मात भारी । सरायं बिचारी ॥ करी जाकु ईसं । धस्यौ पुच सीसं ॥ ६० ॥ सवै कज्ज अग्गै । तुही नाम लग्गै ॥ कजानंद रूपं । गनेसं सधूपं ॥ ६१ ॥ इकं दंन्त दन्ती । विराजंत कंती ॥ सुभै दंत ऐसे । कविंदं प्रसंसै ॥ ६२ ॥ मनो भूमि धारी । बराहं उपारी ॥ इसी नट्ठ तेजं । कला सोम केजं ॥ ६३ ॥ नमो देव कहं । प्रजा ईस महं ॥ अखै भूत प्रेतं । तिजारी न घेतं ॥ ६४ ॥ सारसा, लंबी, जा; विघना, कचं, जा, मदं, अग्ने, जा, करः, स्यु, दीर, पृथ्रिराज, काव्य और कृते । इन में एक पृथीराज शब्द के स्थान में जो हमने पृथ्रिराज पाठ रक्खा है वह एक रासे की पुस्तक में है और चंद का ऐसा प्रयोग देख कर राजपूताने और बृज की गामीण भाषाओं से परिचित विद्वानों को कुछ आश्चर्य न होगा क्योंकि उनों ने ऐसे ही गजराज के स्थान में गज्ज्राज बोलते और लिखते लोगों को देखे और सुने होंगे । यह चंद की हिन्दी के देशी प्रसिद्ध नामक भेद का उदाहरण है ॥ २८ अन्य पुस्तकों में पाठान्तर यह हैं:—करुना, सात, नष्व, दियो, रिषि, अबल्लाइ, कल्ली, पुरुष, डोरं, धंधा, तुहि, दट्ठ, दैहै, देह, भगतं, लछी, लच्छी अर्थ, नयं, समती, पती, धरे, त्रिलोक और ईसा । इस रूपक के छंद का नाम चंद ने विराज कहा है परंतु उस का नामान्तर संखा नारी और उस का लक्षण यह है:—

इकं दीह एकं । दुती दीह मेकं ॥ भगत्तं सुचक्की । दियो नच्चि वक्की ॥ ६५ ॥ इकं चोख अघ्यं । करै नाक नघ्यं ॥ सुभक्ती समत्ती । जलं माचि पत्ती ॥ ६६ ॥ धरै आक सीसं । त्रिलोकेस ईसं ॥ चयं वेद जक्की । प्रियं चंद भक्की ॥ छं० ॥ ६७ ॥ रू० ॥ २८ ॥ ॥ संकर की स्तुति ॥ दूहा ॥ नमस्कार संकर कियौ । सरसैं वुधि कवि चंद ॥ सति लंपट लंपट नवी । अबुधि मंच सिसु इंद ॥ छं० ॥ ६८ ॥ रू० ॥ २९ ॥ साधन भोग संयोग रजि । मंडन आव अखूट ॥ नमो उमा उर आभरन । जय बंधन जट जूट ॥ छं० ॥ ६९ ॥ रू० ॥ ३० ॥ विराज ॥ जटा जूट वंदं । लिलाटंत चंदं ॥ विराजंत इंदं । भुजंगी गविंदं ॥ ७० ॥ शिरो माल इंदं । गिरीजा अनंदं ॥ सिरै सिंधु नहं । रनैं वीर महं ॥ ७१ ॥ करी चर्म सहं । करं काल खहं ॥ उनैं गंग चहं । चखी अग्गि दहं ॥ ७२ ॥ प्रलै जानि जहं । जयो जोग सहं ॥ घटा जानि भहं । जरै काम तहं ॥ ७३ ॥ हरै चाचि वहं । रचै मोछ कहं ॥ बचै दूरि दहं । नटे भेख रहं ॥ ७४ ॥ नमो ईस इंदं । बदै भद्द चंदं ॥ छं० ॥ ७५ ॥ रू० ॥ ३१ ॥ कई वर्ण वारो । यगन्नै दुधारो ॥ रचो पाव चारी । करो संखनारी ॥ श्रीधर कवि कृत पिंगल ॥ ३० पाठान्तरः — सरसै । सती । संजोग ॥ ३१ पाठान्तरः — गिरिजा । रनै । वीर । खहुं । गंगहद्दं । हद्दं । सद्दं ॥. इस रूपक का छंद ७५ चंद की संस्कृत काव्य-सम-श्लोकार्द्ध शैली का दूसरा उदाहरण है। देखो टिप्पण १४ को ॥

२२ पृथ्वीराजरासौ। [आदि पर्व दूहा ॥ करियै भक्ति कवि चंद हर । हरि जंपिय इह भाइ ॥ ईस स्याम जू जू कहै । नरक परंतच जाइ ॥ छं० ॥ ७६ ॥ रू० ॥ ३२ ॥ श्लोक ॥ परात्परतरं यांति । नारायण परायणं ॥ न ते तत्र गमिष्यंति । ये दुष्यंति महेश्वरं ॥ छं० ॥ ७७ ॥ रू० ॥ ३३ ॥ साटक ॥ गंगाया अगुलत्त वसनं मसनं, लच्छी उमा दोवरं ॥ संख्ं भूत कपाल माल असितं, वैजंति माला धरी ॥ चर्म मद्य विभूति भूतिक युगं, विभूति साया क्रमं ॥ पापं विचरति मुक्ति अप्पन वियं, बीयं वरं देवयं ॥ छं० ॥ ७८ ॥ रू० ॥ ३४ ॥ ॥ कवि की आशा का स्वरूप वर्णन ॥ गाहा ॥ आसा मच्चीव कव्बी । नवनववित्तीय संग्रहं ग्रंथं ॥ सागर सरिस तरंगी । वोहत्थयं उत्थियं चञ्चयं ॥ छं० ॥ ७९ ॥ रू० ॥ ३५ ॥ ॥ चंद का काव्य समुद्र कैसा है ॥ दूहा ॥ काव्य समुद्र कवि चंद कृत । सुगति समप्पन ग्यान ॥ राजनीति बोहिथ सुफल । पार उतारन यान ॥ छं० ॥ ८० ॥ रू० ॥ ३६ ॥ छंद प्रबंध कवित्त जति । साटक गाह दुहत्थ ॥ लघु गुर मंडित खंडिय, छ । पिंगल अमर भरत्थ ॥ छं० ॥ ८१ ॥ रू० ॥ ३७ ॥ ३२ पाठान्तरः - करिये । ३३ पाठान्तरः - यांति । ज्ञे । यह श्लोक चंद के शुद्ध संस्कृत काव्य रचन का प्रथम उदाहरण है ॥ ३४ पाठान्तरः - अगुलत्त । वसनमसनं । लछी । कपालमाल । चमभूतिकयुगं । मायाक्रमं । मुक्तिं । वरंदेवयं ॥ ३५ पाठान्तरः - क्रित्ती ॥ ३६ पाठान्तरः - ग्यांन । यांन । ३७ पाठान्तरः - भरत्य ।

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । २३ ॥ कोई अशुद्ध पढ़ने वाला चंद को काव्य-संबन्धि दोष न दे ॥ कवित्त ॥ अति ढंक्यौ न उघार । सलिल जिमि छिप्पि सिवालह ॥ वरन वरन सोभंत । चार चतुरंग विसानह ॥ विमल अमल वानी विसाल । वयन वानी वर अंनन ॥ उक्तिन वयन विनोद । जोइ स्रोतन सन अंनन ॥ युत अयुत जुक्ति विचार विधि । वयन छंद हुक्यौ न कछ ॥ घटि बढ़ि मति कोई पढ़इ । तौ चंद दोस दिज्जो न वह ॥ छं० ॥ ८२ ॥ रू० ॥ ३८ ॥ ॥ इस ग्रंथ में चंद ने क्या २ कथन किया है ॥ श्लोक ॥ उक्ति धर्मे विशालस्य । राजनीति नवं रसं ॥ षट् भाषा पुराणं च । कुरानं कथितं मया ॥ छं० ॥ ८३ ॥ रू० ॥ ३६ ॥ ॥ रासे को रसिया सरस उच्चारैं ॥ कवित्त ॥ चरन नीम अच्छिर सुरंग । पाट बहु गुरु विधि संडिय ॥ सुर विकास जारी सु मुष्प । उक्ति रस गौरव नि छंडिय ॥ जुगति छोह विस्तारिय । सीढियन घाट सु बहिय ॥ मछि मंडन सेधान । याहि संडन जस सहिय ॥ ३८ पाठान्तरः - पिप्पि । विशाल । विच्चार । पढई । दिज्जो । दिन्नै । ३९-कवि का यह संस्कृत श्लोक हमारे पाठकों के सदा ध्यान में रखने योग्य है इस के सूक्ष्म विचार से हम जान सक्ते हैं कि पटभाषा और कुरान की भाषा के जो २ शब्द इस महाकाव्य में प्रयोग हुए हम देखते हैं वह कवि ने जानकर प्रयोग किये हैं और कुरान की भाषा के शब्दों के प्रयोग का विषय कोई आश्चर्यदायक भी नहीं है क्योंकि मुसलमानों का प्रवेश भरत- खंड में शहाबुद्दीन गोरी के बहुत ही पहिले हो गया है । इस के अतिरिक्त हम को यह भी निश्चय मानना चाहिये कि चंद संस्कृत भाषा में निपुण था और षट्भाषा और कुरान की भाषा से भी अपरिचित नहीं था और जो २ छंद इस महाकाव्य में संस्कृत भाषा में लिखे हमारे दृष्टि आते हैं वह उस की संस्कृत-काव्य-रचन शक्ति के उदाहरण रूप हैं । यह श्लोक चंद के माने हुए पिंगल छंद सूत्रम् के अनुसार लौकिक अनुष्टुप अर्थात् अष्टात्तर पद छंद है । इस रूपक के विशेष पाठान्तर अन्य पुस्तकों में दृष्टि नहीं आते किन्तु केवल विशालं के स्थान में विसालं और पुराणं के स्थान में पुरानं पाठ हैं ॥ ४० पाठान्तरः-अछिर । सुरंग । समुष्पं । मुप्प । गैपिंत । सिढियन । मेधान । याहि । चित्ररंग । विश्वकर्म कर्म । उच्चारिय ॥

२४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व .घन तर्क उतर्क वितर्क जति । चिच रंग करि करि. अनुसरिय ॥ विश्वकर्म कवि निर्मेइय । रसियं सरस उच्चरिय ॥ ॥ छं० ॥ ८४ ॥ रू० ॥ ४० ॥ ॥ रासे का तत्त्वज्ञान कैसे होगा ॥ अरिल्ल ॥ तर्क वितर्क उतर्क सु जत्तिय । राज सभा सुभ आसन अत्तिय ॥ कवि आदर सादर बुध चाचौ । पढ़ि करि गुन रासौ निर्बाचौ ॥ ॥ छं० ॥ ८५ ॥ रू० ॥ ४१ ॥ धर्म्म अधर्म्म न बुद्धि बिचारौ । नयन नारि नियन नेह निचारौ ॥ कोक कला कज केलि प्रकासौ । अरथ करौ गुन रासौ भासौ ॥ ॥ छं० ॥ ८६ ॥ रू० ॥ ४२ ॥ पारासर जो पुत्त विचासद्द ॥ सतवंती ग्रब्भं गुर भासद्द ॥ प्रब्ब अठार सवा लष लष्यै । तौ भारथ गुर तत्त विसष्यै ॥ ॥ छं० ॥ ८७ ॥ रू० ॥ ४३ ॥ ॥ जो रासे को सुगुरु से पढता है वह कुमति नहीं दरसाता ॥ कवित्त ॥ रासौ बर बुद्धि सिद्धि । सुद्धि सो सब्व प्रमानिय ॥ राजनीति पाइयै । ग्यान पाइयै सु जानिय ॥ उकति जुगति पाइयै । अरथ घटि वढि उन मानिय ॥ या समान गुन आप । देव नर नाग बखाणिय ॥ अंविभ्रत भंत व्रतच गुनित । गुन चिक्कण सरसइय ॥ जो पढ़य तत्त रासौ सुगुर । कुमति मति नहिं दरसइय ॥ ॥ छं० ॥ ८८ ॥ रू० ॥ ४४ ॥ ४१-४३-इस रूपक के छंद का नाम कवि ने अरिल्ल प्रयोग किया है कि जिस का लक्षण यह है :- ॥ अरिल्ल ॥ लघु दीरघ को नेम न कीजै । ऐसे ही तुक चार भरीजै ॥ षोडश कला कली बिच धारै । छंद अरिल्ला शेष उच्चारै ॥ पाठान्तर :- सुजतिय । मतिय । पढ़ि शब्द के पहिले तौ शब्द का पाठ पुस्तकान्तर में विशेष है । पटि । नारिनिय । कौक । कंन्नाकल । अरथ शब्द के पहिले तौ शब्द किसी २ पुस्तक में विशेष है । ग्रभं । लख । लखै । नारथ ॥ ४४ पाठान्तर :- राज । नीति । पाईयै । उक्ति । पांइयै । पांईयै । उन । मांनियं । व्रतह । सरसइय शब्द के पहिले किसी २ पुस्तक में मध्य शब्द का विशेष पाठ है । सरसईयं । दरसईयं ॥