भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 29

५० . पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व मुक्ति-स्तुति । कवित्त ॥ भुगति भूमि किय क्यार । वेद सिंचिय जल पूरन ॥ बीय सुबय लय मध्य । ग्यांन अंकू रस जूरनं ॥ चिगुन साख संगहिय । नाम बहु पत्त रत्त क्खिति ॥ सुक्रम सुमन फुल्ल्यै । सुगति पक्की द्रव संगति ॥ दुज सुमन उसिय बुध पक्क रस । वट विस्वास गुन पस्तंरिय ॥ तरु इक्कसाख चय लोक मद्धि । अजय विजय गुन विस्तरिय ॥ कं० ॥ ४ ॥ रु० ॥ ४ ॥ पूर्व कवियों की स्तुति और उच्छिष्ट संज्ञा कथन ॥ ॥ भुजंगप्रयात ॥ प्रथमं भुजंगी सुधारी ग्रहंनं । जिनें नाम एकं अनेकं कहंनं ॥ से छंद टूटता है । गुजराती भाषा में ऐसे शब्द बहुत आते हैं जैसे मुकुन्दराम का मक्रन्दराम, तुलसी का तलशी, और शिव का शव । ऐसे मुख दोष के कारण से बिगड़े हुए शब्दों के रूपों के लिये एक यह श्लोक भी प्रसिद्ध है :- गुर्जरा मुख दोषेण । शिवोपि शवतां गताः ॥ तुलसी तलशी जाता । मुकुन्दोपि मक्रन्दतां ॥ इस के अतिरिक्त चंद की हिन्दी में ऐसे प्रयोग बहुत से आवेंगे जैसे "विन्दलालाट प्रसेद कियो" यहां प्रस्वेद का प्रसेद हुआ है । चिहुं के स्थान में चिहुँ किया है क्योंकि यहां अर्ध अनुस्वार प्राप्त है । लगे के स्थान में लग्गो, उद्यत के स्थान में उदयत्त । लागे के स्थान में लगे । और सति मति के स्थान में सत्ति मत्ति सुधारे हैं क्योंकि ऐसे पाठ सुधारने को छंद के टूटने का दोष हम को स्वयम् सचेत करता है ॥ इस रूपक में भी चंद कवि रूपकालंकार से कर्म की स्तुति करता है ॥ ४ इस के पाठ में एशियाटिक सोसाइटी आदि की पुस्तकों में जो अंकूर और सजूरन पाठ हैं वह एक बालक भी जान सक्ता है कि बड़े ही अशुद्ध हैं किन्तु दृष्टि देने से हमारे किये पदच्छेद से सार्थक पाठ हो जाते हैं अर्थात् अंकू रस जूरन । हम ने रत के स्थान में रत्त क्खित्ति के स्थान में क्षिति पाठ किये हैं । हमारे उसिय पाठ के स्थान में आगरा कालेज और बेदले आदि की पुस्तकों में असिय पाठ है परंतु वह अशुद्ध है । मालूम होता है कि उन के लेखकों ने उ को ऐसा ऊ समझ कर अशुद्ध पाठ लिख दिया है और अर्थ पर दृष्टि देकर प्रति नहीं कियी है ॥ स्मरण में रखना चाहिये कि इस रूपक में कवि रूपकालंकार से मुक्ति की स्तुति करता है । अर्थात् चंद ने दूसरे तीसरे और इस चौथे रूपकों में क्रम से धम्मेश्वर, कम्मेँश्वर, और मुक्तेश्वर नामक ईश्वरों के मंगलाचरण किये हैं ॥ ५ इस भुजंगप्रयात नामक छंद का लक्षण चंद कवि के माने हुए छंद ग्रंथों में से पिंगल मुनि