पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 30, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ११ दुती लम्भयं देवनं जीवतेसं । जिनैं विश्व राख्यो बली मंच सेसं ॥ चवं वेद बंभं हरी कित्ति भाखी । जिनैं ध्रम्म साधम्म संसार साखी ॥ तृती भारती व्यास भारत्य भाख्यौ । जिनैं उत्त पारत्थं सारत्थ साख्यौ ॥ चवं सुखदेवं परीखत्त पायं । जिनैं उड्डयौ अ्रब्ब कुवेंस रायं ॥ नरं रूप पंचम्म श्रीहर्ष सारं । नलैराय कंठं दिने पल्ल धारं ॥ षटं कालिदासं सुभाखा सुबद्धं । जिनैं बागवानी सुबानी सुबद्धं ॥ कियो कालिका मुख वासं सुसुद्धां । जिनैं सेत बंध्योति भोज प्रबंधं ॥ सतं डंडमाली उछाली कविंत्तं । जिमैं बुद्धि तारंग गंगा सरित्तं ॥ जयदेव अ्ठं कवी कब्बिरायं । जिनैं केवलं कित्ति गोविंद गायं ॥ गुरं सब्ब कब्बीं लहू चंद कब्बी । जिनैं दर्सियं देवि सा अंग छब्बी ॥ कवी कित्ति कित्ती उकत्ती सुदिक्खी । तिनैं की उच्छिष्टी कवी चंद भक्खी ॥ , कूं० ॥ १० ॥ रू० ॥ ५ ॥ यह लिखते हैं कि “भुजंग प्रयातं यः ॥ ३८ ॥ अर्थात् जिस के पाद में चार यकार (यगण) हों वह भुजंगप्रयात नामक छंद कहाता है ॥ इस पांचवें रूपक के जो पाठ एशियाटिक सोसाईटी की और अन्य पुस्तकों में बहुत अशुद्ध हैं वह यह हैं:- प्रथम । यहनं । कहनं । लम्भयं । भारथं । उतपारथ । सारथ । सुखदेवं । परीक्षंत । उट्टयौ अब्र । कुरुवंस । पल्ल । कालिदास । मुख्य । सुसुद्ध । वंध्यौ । तिभोजन । बुद्धितारंग । गंगासरित्तं । जयदेवं । अठं । केवलं । दरसिय । उकति । तिन । कवि । और भष्थी । इन में से प्रत्येक को सिद्ध करने के लिये जो हम सतर्क विवेचना करें तौ बहुत स्थान चाहिये परंतु मैं आशा करता हूं कि पुरातत्त्ववेत्ता इन को हमारे शुद्ध पाठों से मिलाकर और जो कुछ चंद कवि की हिन्दी के नियम हम ने संक्षेप में पहिले प्रकाश किये हैं उन से विचार कर सिद्ध कर लेंगे । इस रूपक में चंद कवि अपने से पहिले हुए मुख्य २ कवियों की स्तुति करके अंत की दो तुकों में उन को अपने गुरु मान कर और आप निरभिमानी होकर अपने काव्य को उनके कहे काव्य की उच्छिष्टी होने की संज्ञा देता है । जैसे कि इस महाकाव्य के किसी २ रूपक में चंद के समय के पीछे वरते हुए वृत्त लिखे प्राप्त होते हैं और उन पर से इस ग्रंथ की प्रामाणिकता में संदेह किया जाता है वैसे ही यह रूपक क्या इस ग्रंथ की प्रामाणिकता के सिद्ध करनेवाला एक प्रमाण रूप नहीं है? और अन्य कवि जैसे श्रीहर्ष और जयदेवादि के समय के निश्चय और निर्णय करने में पुरातत्त्ववेत्ताओं का सहायक और उपकारी नहीं हो सक्ता है ? इस के अतिरिक्त इस छंद की तीसरी तुक में जो एक बंभ शब्द चंद कवि ने प्रयोग किया है उस को देख कर चारण राव और भाट जाति के अच्छे २ कवियों को हम ने आश्चर्य करते हुए देखे हैं और वे इस का अर्थ अंड बंड करते हैं । कोई उस को ब्रह्म शब्द का अपभ्रंश बतलाते हैं और कोई चारों वेदों के ब्राह्मण ग्रंथों का वाचक बतलाते हैं और कोई कहते हैं कि महादेव की मूर्ति के आगे जो गाल बजा के बंब शब्द मुख से करते हैं और ऐसा करने से महादेव प्रसन्न हो