भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 470 में से

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पृष्ठ 28

[आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ६ ॥ कर्म्म-स्तुति ॥ कवित्त ॥ प्रथम मंगल्ल प्रमान । निगम संपजय वेद धुर ॥ त्रिगुन साख चिहुँ चक्र । वरन लग्गो सु पत्त कर ॥ त्वचा भ्रम्म उड्डरिय । सत्त फूल्यो चावहिसि ॥ क्रम्म सुफल उदयत्त । अमृत सुम्रत मध्य वसि ॥ डुलै न वाय नृप नीति अति । खाद अमृत जीवन करिय ॥ कलि जाय न लगै कलंक इहि । सत्ति मत्ति आठति धरिय ॥ कं० ॥ ३ ॥ रू० ॥ ३ ॥ इस छंद की प्रथम तुक की प्रथम यति के प्रथम टुकड़े में बीय पाठ अशुद्ध है उस के स्थान में हम ने बिय किया है । और दूसरी यति के दूसरे टुकड़े में सिंचियइ के स्थान में सिंचिय और धम्मं के स्थान में धम्म और यत के स्थान में पत्त, बारहै को बारह, और परस को पारस शुद्ध किये हैं और यह शोधन ऐसे साधारण हैं कि जिनके लिये कोई तर्क लिखने की आवश्यकता नहीं है ॥ इस रूपक में ग्रंथकर्त्ता वृत्त के रूपकानकार से धर्म की स्तुति करता है ॥ ३ कवि ने इस रूपक के छंद को कवित्त संज्ञा दियो है । संप्रत काल में यह छप्पय, छप्पै, षट- पद, षटपदी आदिक नामों से प्रसिद्ध है परंतु सत्रहवीं शताब्दी के पहिले वह कवित्त नाम से ही प्रसिद्ध था । रूपदीप पिंगल वाले ने भी जो नीचे लिखा छप्पय का लक्षण कहा है उस में उस ने भी यह कहा है कि:-“सुन गरुड पंख पिंगल कहैं । छप्पे छंद कवित्त यह” इस से सिद्ध होता है कि इस ग्रंथ के बनने के समय तक छप्पै का नामान्तर कवित्त करके प्रसिद्ध था ॥ छप्पै लक्षण । लघु दीरघ नहि नेम । मत्त चौबीस करीजै ॥ ऐसे ही तुक सार । धार तुक चार भरीजै ॥ नाम रसावल होय । और वस्तु कभि जानहु ॥ उल्लाला की विरत । फेर तिथ तेरह आनहु ॥ द्वै तुक बनावो अंत की । यत यत में अठ बीस गहु ॥ सुन गरुड़ पंख पिंगल कहै । छप्पै छंद कवित यह ॥ इस के अतिरिक्त मंच्छ कवि कृत रघुनाथ रूपक में भी उस ने छप्पै छंदों को कवित्त कर के ही लिखे हैं ॥ इस के पाठ को शोधन करने में ध्यान में लेने जैसी बात है कि प्रथम और मंगल शब्दों के बीच में जो बहुत सी पुस्तकों में किय शब्द है वह अधिक होने से अशुद्ध है क्योंकि उस पाद में कुल्ल ११ मात्रा होनी चाहियें । बेदले वाली पुस्तक में संपजय शब्द है और एशियाटिक सोसाइटी की छापी हुई पुस्तक में तो संपूर्जय किया गया है-इस में मेरी सम्मति यह है कि पाठ में तो संपजय ही रखना चाहिये परंतु अर्थ करने में संपूर्जय समझना चाहिये-क्योंकि संपूर्जय पाठ रखने