भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 27

[आदि पर्व] पृथ्वीराजरासौ । ७

तिष्ठति (सं० तिष्ठति) रहता है । चंद की हिन्दी के संस्कृत-समभेद का रूप है ॥ ईसं-(सं० पु० ईशः = महादेवे) महादेव । सदाशिव ॥ दुष्ट (सं० न० दुष्टं = अधमे । वंचके) दुष्टं ॥ दुष्ट दहनं = दुष्टों के दहन करने के लिये अथवा दुष्टों के दहनार्थ ॥ दहनं (सं० पु० दहनः = दाहे । भस्मी करणे ।) दहन के लिये चंद की हिन्दी का नपुं० है ॥ सुर्नाथ (सं० पु० सुर + नाथ = रुद्रे) महादेव की ॥ सिद्धि (सं० स्त्रो० सिद्धिः = पादुकांयाम्) पादुका का ॥ अयं (सं० पु० अयः = अयणे । आये ॥ श्रिञ् = सेवायाम्) सेवनं ॥ सिद्धि अयं = पादुका का सेवन ॥ थिर (सं० पु० स्थिरः = स्थिर पदार्थेः) स्थिर वस्तु जैसे:- पर्वत और पृथ्वी आदि ॥ चर (सं० पु० चरः = चले) चर वस्तु अथवा पदार्थ जैसे वस्तु और जलादि ॥ जंगम (सं० त्रि० जंगमः = पशुपत्ती) कीट पतंगादि ॥ जीव (सं० पु० जीवः = प्राणिनि) मनुष्यादि ॥ ध्यान में लेने की बात है कि पंडितों ने सब पदार्थों को स्थावर और जंगम नामक दो भेदों में ही विशेष करके विभक्त किये हैं । परंतु चंद ने सब पदार्थों के चार भेद माने हैं । प्रथम स्थिर, जो सदैव स्थिर रहते हैं, जैसे पर्वतादि; दूसरे चर, जो सदैव स्थिर नहीं रहते, जैसे स्थानादि; तीसरे जंगम, जो जीव दूध नहीं पीते, जैसे कीट पतंगादि; और चौथे जीव, जो दूध पीते हैं, जैसे मनुष्यादि । हम ने किसी २ कवि को इन चारों शब्दों के प्रयोग करने के कारण चंद कवि को दोष देते हुए सुने हैं परंतु यह उनको भूल है, क्योंकि उन्होंने कवि के सूक्ष्म आशय को ध्यान देकर नहीं समझा है ॥ चंद वरदई=इस महाकाव्य का ग्रंथ-कर्त्ता कि जो हिन्दुओं के अंतिम बादशाह पृथ्वीराज जी चौहान का लंगोटिया मित्र और उन के दरबार का कविराज था । वह भट्ट जाति जो आज कल राव करके कहलाते हैं उस के जगत नामक गोत्र का था और उस के पूर्व पंजाब देश के लाहौर नगर के रहने वाले थे और उन की यजमानी अजमेर के चौहानों की थी । उस की जैसी शूरवीरता इस महाकाव्य से विदित होती है उस का मुख्य कारण यहो है कि वह पंजाब देश की अद्यावधि प्रसिद्ध वीर भूमि के तत्त्वों से उत्पन्न हुआ था और राजपूताने के हृदयरूपी अजमेर नगर में बड़ा हुआ था । वह षट-भाषा, व्याकरण, काव्य, साहित्य, छंद शास्त्र, ज्योतिष, वैद्यक, मंत्रशास्त्र, पुराण, नाटक, और गान आदिक विद्याओं में अच्छा व्युत्पन्न पंडित था । उस के पिता का नाम वेण और विद्या-गुरु का नाम गुरुप्रसाद था । उस की दो स्त्रियों के नाम कमला अर्थात् मेवा और गौरी अर्थात् राजोरा और एक लड़की का नाम राज बाई और दश लडकों के नाम सूर १ सुन्दर २ सुजान ३ जल्ह ४ बल्ह ५ बलिभद्र ६ केहरि ७ बीरचंद ८ अवधूत अर्थात् योगराज ९ और गुनराज १० थे । इस महाकाव्य के विषयों को वैसे तो उस ने समय २ पर बना कर कंठ कर रक्खे थे परंतु उन को ग्रंथाकार में उस ने ६०॥ दिन में रचा था और अंत को उस ने रासे की पुस्तक अपने लड़के जल्ह नामक को दियो थी । इस रासे के अतिरिक्त उस के रचे और भी कई एक ग्रंथ सुनने में आते हैं परंतु उन में सब से बड़ा ग्रंथ यह रासा है और अन्य सब ग्रंथ अब विल्कुल्ल नहीं मिलते हैं । उस का सविस्तर जीवनचरित्र और वंशावली जहां तक हमारे जानने में ख्यातादि से आई है वह हम इस ग्रंथ के समाप्त होने पर छाप कर प्रसिद्ध करेंगे ॥