पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व .घन तर्क उतर्क वितर्क जति । चिच रंग करि करि. अनुसरिय ॥ विश्वकर्म कवि निर्मेइय । रसियं सरस उच्चरिय ॥ ॥ छं० ॥ ८४ ॥ रू० ॥ ४० ॥ ॥ रासे का तत्त्वज्ञान कैसे होगा ॥ अरिल्ल ॥ तर्क वितर्क उतर्क सु जत्तिय । राज सभा सुभ आसन अत्तिय ॥ कवि आदर सादर बुध चाचौ । पढ़ि करि गुन रासौ निर्बाचौ ॥ ॥ छं० ॥ ८५ ॥ रू० ॥ ४१ ॥ धर्म्म अधर्म्म न बुद्धि बिचारौ । नयन नारि नियन नेह निचारौ ॥ कोक कला कज केलि प्रकासौ । अरथ करौ गुन रासौ भासौ ॥ ॥ छं० ॥ ८६ ॥ रू० ॥ ४२ ॥ पारासर जो पुत्त विचासद्द ॥ सतवंती ग्रब्भं गुर भासद्द ॥ प्रब्ब अठार सवा लष लष्यै । तौ भारथ गुर तत्त विसष्यै ॥ ॥ छं० ॥ ८७ ॥ रू० ॥ ४३ ॥ ॥ जो रासे को सुगुरु से पढता है वह कुमति नहीं दरसाता ॥ कवित्त ॥ रासौ बर बुद्धि सिद्धि । सुद्धि सो सब्व प्रमानिय ॥ राजनीति पाइयै । ग्यान पाइयै सु जानिय ॥ उकति जुगति पाइयै । अरथ घटि वढि उन मानिय ॥ या समान गुन आप । देव नर नाग बखाणिय ॥ अंविभ्रत भंत व्रतच गुनित । गुन चिक्कण सरसइय ॥ जो पढ़य तत्त रासौ सुगुर । कुमति मति नहिं दरसइय ॥ ॥ छं० ॥ ८८ ॥ रू० ॥ ४४ ॥ ४१-४३-इस रूपक के छंद का नाम कवि ने अरिल्ल प्रयोग किया है कि जिस का लक्षण यह है :- ॥ अरिल्ल ॥ लघु दीरघ को नेम न कीजै । ऐसे ही तुक चार भरीजै ॥ षोडश कला कली बिच धारै । छंद अरिल्ला शेष उच्चारै ॥ पाठान्तर :- सुजतिय । मतिय । पढ़ि शब्द के पहिले तौ शब्द का पाठ पुस्तकान्तर में विशेष है । पटि । नारिनिय । कौक । कंन्नाकल । अरथ शब्द के पहिले तौ शब्द किसी २ पुस्तक में विशेष है । ग्रभं । लख । लखै । नारथ ॥ ४४ पाठान्तर :- राज । नीति । पाईयै । उक्ति । पांइयै । पांईयै । उन । मांनियं । व्रतह । सरसइय शब्द के पहिले किसी २ पुस्तक में मध्य शब्द का विशेष पाठ है । सरसईयं । दरसईयं ॥