पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 40, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । २३ ॥ कोई अशुद्ध पढ़ने वाला चंद को काव्य-संबन्धि दोष न दे ॥ कवित्त ॥ अति ढंक्यौ न उघार । सलिल जिमि छिप्पि सिवालह ॥ वरन वरन सोभंत । चार चतुरंग विसानह ॥ विमल अमल वानी विसाल । वयन वानी वर अंनन ॥ उक्तिन वयन विनोद । जोइ स्रोतन सन अंनन ॥ युत अयुत जुक्ति विचार विधि । वयन छंद हुक्यौ न कछ ॥ घटि बढ़ि मति कोई पढ़इ । तौ चंद दोस दिज्जो न वह ॥ छं० ॥ ८२ ॥ रू० ॥ ३८ ॥ ॥ इस ग्रंथ में चंद ने क्या २ कथन किया है ॥ श्लोक ॥ उक्ति धर्मे विशालस्य । राजनीति नवं रसं ॥ षट् भाषा पुराणं च । कुरानं कथितं मया ॥ छं० ॥ ८३ ॥ रू० ॥ ३६ ॥ ॥ रासे को रसिया सरस उच्चारैं ॥ कवित्त ॥ चरन नीम अच्छिर सुरंग । पाट बहु गुरु विधि संडिय ॥ सुर विकास जारी सु मुष्प । उक्ति रस गौरव नि छंडिय ॥ जुगति छोह विस्तारिय । सीढियन घाट सु बहिय ॥ मछि मंडन सेधान । याहि संडन जस सहिय ॥ ३८ पाठान्तरः - पिप्पि । विशाल । विच्चार । पढई । दिज्जो । दिन्नै । ३९-कवि का यह संस्कृत श्लोक हमारे पाठकों के सदा ध्यान में रखने योग्य है इस के सूक्ष्म विचार से हम जान सक्ते हैं कि पटभाषा और कुरान की भाषा के जो २ शब्द इस महाकाव्य में प्रयोग हुए हम देखते हैं वह कवि ने जानकर प्रयोग किये हैं और कुरान की भाषा के शब्दों के प्रयोग का विषय कोई आश्चर्यदायक भी नहीं है क्योंकि मुसलमानों का प्रवेश भरत- खंड में शहाबुद्दीन गोरी के बहुत ही पहिले हो गया है । इस के अतिरिक्त हम को यह भी निश्चय मानना चाहिये कि चंद संस्कृत भाषा में निपुण था और षट्भाषा और कुरान की भाषा से भी अपरिचित नहीं था और जो २ छंद इस महाकाव्य में संस्कृत भाषा में लिखे हमारे दृष्टि आते हैं वह उस की संस्कृत-काव्य-रचन शक्ति के उदाहरण रूप हैं । यह श्लोक चंद के माने हुए पिंगल छंद सूत्रम् के अनुसार लौकिक अनुष्टुप अर्थात् अष्टात्तर पद छंद है । इस रूपक के विशेष पाठान्तर अन्य पुस्तकों में दृष्टि नहीं आते किन्तु केवल विशालं के स्थान में विसालं और पुराणं के स्थान में पुरानं पाठ हैं ॥ ४० पाठान्तरः-अछिर । सुरंग । समुष्पं । मुप्प । गैपिंत । सिढियन । मेधान । याहि । चित्ररंग । विश्वकर्म कर्म । उच्चारिय ॥