भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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आदि पर्व ] . पृथ्वीराजरासो । २५ ॥ रासा किस को अच्छा और किस को बुरा प्रतीत होता है ॥ दूहा ॥ कुमति मति दरसंत तिहिं । बिधि बिना न अव्वान ॥ तिहिं रासौ जु पवित्र गुन । सरसौ बन्न रसान ॥ ॥ छं० ॥ ८९ ॥ रु० ॥ ४५ ॥ ॥ इस ग्रंथ के काव्य की संख्या का कथन ॥ दूहा ॥ सत सहस नष सिष सरस । संकल आदि मुनि दिष्य ॥ घट बढ मत कोऊ पढौ। मोहि दूसनं नवसिष्य ॥ छं० ॥ ९० ॥ रु० ॥ ४६ ॥ ॥ रासे के ढँके हुए अर्थ के विषय में कवि का कथन ॥ गाहा ॥ अरथं ढंकिन सहसा । उघारै वनत्थि एकलया ॥ मभझं मभझ प्रमानं । चतुर स्त्री चारयं जेमं ॥ छं० ॥ ९१ ॥ रु० ॥ ४७॥ ॥ इस ग्रंथ के विष का संक्षेप कथन ॥ कवित्त ॥ दानव कुल छत्रीय । नाम ढुंढा रष्स वर ॥ तिहिं सु जोत प्रथिराज । सूर सामंत अस्ति भर ॥ जीह जोति कवि चंद । रूप संजोगि भोगि श्रम ॥ इक्क दीह उपन्न । इक्कं दोहै समाय क्रम ॥ जथ कत्थ तथ्य होइ निर्मये । जोग भोग राजन खत्तिय ॥ बज्रंग बाहु अरि दल मलन । तासु कित्ति चंदह कत्तिय ॥ ॥ छं० ॥ ९२ ॥ रु० ॥ ४८ ॥ अरिल्ल ॥ प्रथम राज चहुवांन पिथ्य वर । राजधान रंजे जंगल धर ॥ मुष सू भट सूर सामंत दर । जिन्हि बंध्यो सुरतांन प्रान भर ॥ ॥ छं० ॥ ९४ ॥ रु० ॥ ४९ ॥ ४५ पाठांतर:-दरसंन । तिहि । तिहि । रसानं ॥ ४६ पाठांतरः-कोऊ ॥ इस में “सत सहस” से कवि एक लाख की ग्रंथ संख्या बताता है और यह भी कहता है कि घटं बढं पठ करके मुझे दोष मत देना । कोई २ कवि जो यहां सत शब्द से सात का अर्थ अनुमान करते हैं वह मेरी सम्मति में अयुक्त प्रतीत होता है ॥ ४७ पाठांतरः-ढकिनं । नवत्थियं । मझ । मझ ।- ४८-५० पाठांतरः-रष्षसं । तिहि । जिह । संजोगी । भोगी । उपन्ने । जोगराज । नाल- हिय । बज्रंगबाँहुं । अरि दलं मलनं । कुत्तीं । चंदं ॥ ४७ ॥ सुर ॥ ४८ ॥ मित्त । बंधो । कित्ति । अष्यो । तिथि ॥ ४९ ॥