पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व बुधि तरंग सम गंग । उकति उच्चार अमिय कल ॥ सुरन सुनत विहसंत । संत जनु वश्य करन बल ॥ अवतार भूप पृथिराज पहु । राज सुख तिन सम लच्छि ॥ बीराधि बीर सामंत सब । तिन सु गल्ह अच्छी कच्छि ॥ छं० ॥ १४ ॥ रू० ॥ ९ ॥ ॥ चंद अपनी स्त्री की शंका का पुनश्च समाधान करता है ॥ कवित्त ॥ गज़ गवनी प्रति चंद । छंद कोमल उच्चारिय ॥ मनहरनी रस बेलि । सुरन सागर रस धारिय ॥ बंक नयन बय बाल । प्रान वल्लभ सुखदाइय ॥ अशुन निगुन गुरु अवनि । गवरि पूजा फल पाइय ॥ भए आदि अंत कविता जिते । तिन अनंत गति मति कछिय ॥ अनेक ग्रंथ तिन बरनवत । यौं उचिष्ट मति मैं लछिय ॥ छं० ॥ १५ ॥ रू० ॥ १० ॥ ॥ चंद अपनी स्त्री के आगे ईश्वर के ऐश्वर्य का वर्णन करता है ॥ ॥ पद्धरी ॥ प्रनम्म प्रथम मम आदिदेव । ॐकार सब्द जिन करि अकेव ॥ निरकार मध्य साकार कीन । मनसा विलास सच फल फलीन ॥ १६ ॥ चयगुनह तेज चयपुर निवास । सुर सुरग भूमि नर नाग भास ॥ पुनि ब्रह्मरूप ब्रह्मा उचारि । कथि चतुरवेद प्रभु तत्त सारि ॥ १७ ॥ है कि चंद की स्त्री अपने पति से कहती है कि तुम कंठ कौमार काव्य कृत हो अर्थात् तुम को कौमार काव्य कंठ है। क्या यह भी चंद के संस्कृत भाषा में व्युत्पन्न होने का एक अच्छा प्रमाण नहीं है? १० अन्य पुस्तकों में यह पाठ अशुद्ध हैं बेली, सुखदाईय, जितै, बरन, बत और मैं। इस रूपक में गवरि शब्द श्लेषार्थ में कवि ने प्रयोग किया है क्योंकि ख्यातियों में चंद की स्त्री का नाम गौरी करके प्रसिद्ध है ॥ ११ इस रूपक के छंद का नाम पद्धरी है और उस का लक्षण यह है:- दस करो प्रथम फिर षट मिलाय । गिन षोडश मत्ता पाय पाय ॥ इक जगन अंत में धरत सोय । भनि शेष पद्धरी छंद होय ॥ रू० दी० ॥ इस रूपक में चंद अपनी स्त्री को ईश्वर का ऐश्वर्य वर्णन कर बताता है और पहिली तुक में प्रनस्य पाठ नहीं ग्रहण करना चाहिये किन्तु प्रनम्म पाठ ठीक है अर्थात् चंद अपनी स्त्री को