पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १३ तंत बीर उग्रंत । रंग राजन सुख दाइय ॥ बाल केल प्रत्यंग । सुरनि उड्ढरि कविताइय ॥ अवलंब उकति उच्चार करि । जिचित्त सोच्चि कोविद् रचै ॥ सम ब्रह्मरूप या सबद कहुँ । क्यों उच्छिष्ट कवियन कथै ॥ कूं० ॥ १२ ॥ रू० ॥ ७ ॥ ॥ चंद अपनी स्त्री की शंका का समाधान करता है ॥ कवित्त ॥ सम बनिता वर बंदि । चंद जंपिय कोमन्न कन्न ॥ सबद् ब्रह्म इह सत्ति । अपर पावन कंचि निर्मल ॥ जिह्वित सबद् नहिं रूप । रेख आकार व्रन्न नहिँ ॥ अलख अगाध अपार । पार पावन चयपुर महिँ ॥ तिहिँ सबद् ब्रह्म रचना करौं । गुरु प्रसाद सरसैं प्रसन ॥ जयपि सु उकति चूकौं जुगति । तौ कमल वदनि कवित्त हँसन ॥ कुं ॥ १३ ॥ रू० ॥ ८ ॥ ॥ चंद की स्त्री पुनश्च शंका करती है ॥ कवित्त ॥ तुम वानी बरबंद । नाग देखंत विमल मति ॥ छंद भंग गन रचित । कंठ कौमार काव्य कृत ॥ पति, यह तीनों चंद की हिन्दी के संस्कृत - सम प्रयोग हैं । और तंत और मंत शब्दों के प्रयोग भी दृष्टि देने जैसे हैं तंत पावन में तंत = तत्व और तंत मंत में तंत = तंत्र और मंत = मंत्र के वाचक कवि ने प्रयोग किये हैं ॥ अन्य पुस्तकों में यह अशुद्ध पाठ हैं :- सु, जंपिय, कवि, सुख, दाईय, कविताईय, को, विद, समब्रह्मरूप, कहुं, कविय और न ॥ ८ चंद इस रूपक में अपनी स्त्री को उस की शंका का उत्तर देकर समाधान करता है । शब्दब्रह्म (सं० शब्दात्मकं ब्रह्म) शब्द का प्रयोग चंद की व्याकरण और वेदान्त विद्या के ज्ञान का द्योतक है । गुरुप्रसाद शब्द यहां श्लेषार्थ में कवि ने प्रयोग किया है क्योंकि ख्यातियों के अनुसार चंद के विद्या-गुरु का नाम गुरुप्रसाद था । यद्यपि कुछ विशेष वृत्त नहीं मिलते तथापि यह गुरुप्रसाद नामक पंजाब देश का रहनेवाला एक बड़ा पंडित हुआ है । कवित्तह चंद की हिन्दी का निज प्रयोग है और उस का अर्थ कवित्त अर्थात् काव्य रचनेवाले कवि का है । किसी २ पुस्तक में जो वरबंदि, अमल, अबल, चयपूर, महि, तिहि, और प्रसव पाठ हैं वे अशुद्ध हैं ॥ ९ जिन पुस्तकों में यह पाठ हैं:- अभीय, सुनर, और समलहहि, वह अशुद्ध हैं इस में दूसरी तुक का दूसरा पाद "कंठ कौमार काव्य कृत" विद्वानों के ध्यान देने जैसा है । इस का आशय यह