पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३ शब्द जिन करि अच्छेव' ॥ चौथे इस तुक में प्रथम मगण होने के कारण तीनों अक्षर दीर्घ होने चाहियेँ, अतएव कवि ने आदी देव ऐसा पाठ कहा है। आदि शब्द संस्कृत में इकारान्त है परंतु उसे कवि ने यहां मगण होने के कारण के अतिरिक्त गानविद्या संबंधी दोष दूर करने के अभि- प्राय से भी ईकारान्त किया है क्योंकि चंद गानविद्या में भी निपुण था और साटक के गाने में तुक की पहिली चौथी मात्रा पर ताल आता है। यद्यपि मेरी कल्पना तौ यह है परंतु जब मैंने इस ग्रंथ का कुछ भाग कोटा राज्य के विद्वान कविराज श्री चंडीदानजी से पढा था तब उनों ने यह बतलाया था कि आदि के पहिले ओ३म् शब्द का प्रयोग कवि चंद ने किया था और उस का अर्थ आदि ओ३म् प्रनम्य अर्थात "पहिले ओंकार को नमन करके" किया था। यद्यपि यह प्रयोग भी कुछ बैठ जाता है और ठीक सा मालूम होता है और जितनी पुस्तकें रासे की मेरे देखने में आईं हैं उन में प्रायः ऐसा ही पाठ मिलता भी है परंतु मैं इस की अपेक्षा मेरी कल्पना को अधिक बलवान और युक्त मानता हूं और आशा करता हूं कि यदि वे अब विद्यमान होते तौ मेरी इस कल्पना को प्रसन्नतापूर्वक मान लेते। यदि कोई ओ३म् आदि प्रनम्य ऐसा भी पाठ मानें तथापि कुछ हानि नहीं है। और जब तक कि किसी बहुत प्राचीन पुस्तक में हमारे इस मानने के विरुद्ध कोई अन्य पाठ न मिल जावे तब तक मैं इस को मानना अयोग्य नहीं समझता हूं ॥ अब दूसरी पंक्ति का पाठ "सिट्टं धारन धारयं वसुमती लच्छीस चरनाश्रयं" है । इस में १२ + ८ = २० अक्षर हैं किं यहां चरनाश्रयं शब्द को मैंने चरणाश्रयं किया है क्योंकि कोई छंद गान से खाली नहीं है और साटक की छांन के अनुसार उच्चारण में यहां रकार स्वर रहित हो जाता है और जैसा उच्चारण और गान में रूप हो वैसा काव्य में लिखने में भी कोई दोष नहीं है । जो कवि गान के नियमों से अपरिचित हैं उन के काव्य में ऐसे स्थलों में अनेक दोष रह जाते हैं क्योंकि गान छंद के लिये एक कसौटी है और ऐसे ही मौकों को कवि का अधिकार अर्थात् Poetical Licence कहते हैं । कोई २ विद्वान कवि के अधिकार की छूट अर्थात् Poetical Licence को दोष मानते हैं परंतु वह एक भ्रम है क्योंकि सस्वर अक्षर का खोड़ा कर देना और खोड़े को सस्वर कर देना व्याकरणादि भिन्न शास्त्रों में दोष समझना चाहिये परंतु छंद रचन और गान में तौ यह दोष नहीं कहाता है देखेः चंद के इन वचनों के भीतरी आशयों से भी हम यही अनुमान कर सक्ते हैं :- लघु गुर मंडित खंडिय हि । पिंगल अमर भरत्थ ॥ ३७ ॥ १ चरन नींम अच्छिर सुरंग । पाट लघु गुरु विधि मंडिय ॥ सुर विकास जारी सु मुष । उक्ति रस गौरब नि छंडिय ॥ ४० ॥ १ तीसरी पंक्ति के पाठ तम गुन तिष्ठति ईस दुष्ट दहनं । सुरनाथ सिद्धिश्चर्यं में १४ + ८ = २२ अक्षर हैं । इस में उपर कही हुई युक्तियों के सिवाय थोड़ा सा और ध्यान देने से ज्ञात हो सक्ता है कि ग्रंथकर्त्ता ने तम गुन और सुरनाथ पाठ नहीं प्रयोग किये थे किन्तु जैसे हम ने अनुमान कर शुद्ध किये हैं तं गुं और सुरनाथ क्योंकि प्रथम तौ इस साटक छंद में मगण होने के कारण तं और गुं ही होने चाहियेँ और दूसरे चंद के ऐसे प्रयोग इस काव्य में बहुत से स्थलों पर दृष्टि आवेंगे । यह भी हमारे देखने में आवेगा कि त्वम् और अहम् के स्थान में तं और हुं जैसे प्रयोग चंद ने किये हैं । इस में हम को कुछ भी आश्चर्य नहीं करना चाहिये क्योंकि चंद के इस नीचे लिखे वाक्य से हम अच्छी तरह समझ सक्ते हैं कि उस ने अपने इस महाकाव्य की भाषा में षट भाषा और कुरान की भाषा का आश्रय किया है:-