पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व श्लोक ॥ उक्ति धर्म विशालस्य । राजनीति नवं रसं । षट भाषा पुराणं च । कुरानं कथितं मया ॥ १ ॥ ३६ अब शेष चौथी पंक्ति का पाठ “थिर चर जंगम जीव चंद नमयं सर्वस वरदा मयं” में १४ + ८ = २२ अक्षर हैं । इस के स्थान में जो यह पाठ “थिर्चजंगम जीव चंद नमयं संर्वस वर्दामयं” शुद्ध किया गया है उस के लिये ऊपर कही हुई युक्तियों से ही हमारा शोधन करना ठीक मालूम हो सक्ता है । इस में इतना कहना और भी आवश्यक है कि सोसाइटी की मुद्रित कियी पुस्तक में जो चंदनमयं पदच्छेद किया है वह अयुक्त है और मिस्टर ऐफ. ऐम. ग्राउज साहब ने जो चंद और नमयं पदच्छेद किये हैं वह ठीक हैं और मैं भी मिस्टर ग्राउज के पदच्छेद से सम्मत हूं ॥ जो पाठ हमने जिस रीति से इस रूपक में शुद्ध किये हैं वह अथवा वैसे ही और भी पाठ जो कहीं आगे इस ग्रंथ भर में आवेंगे तो हम उन पर सर्वत्र टिप्पण नहीं करेंगे किन्तु वहां का मूल पाठ हमारे यहां पर वर्णन किये शोधन प्रकार के अनुसार शुद्ध रहेगा । पाठक महाशय इन ही नियमों से उन पाठों को सिद्ध कर समझ लें अर्थात् जिस नियम को एक स्थान पर टिप्पण में वर्णन कर देंगे वह अन्यत्र नहीं कहा जावेगा । किन्तु जहां कोई नवीन प्रयोग आवेगा वहां उस का वर्णन कर दिखावेंगे ॥ जैसे कि चंद के प्रयोग किये हुए छंदों के नाम और उन के लक्षणों के शोध करने में पुरातत्त्ववेत्ताओं को परिश्रम पड़ता है वैसे ही उस के इस महाकाव्य के अर्थ लगाने में भी अनेक प्रकार की अडचनें उपस्थित होती हैं । यद्यपि हमारा मुख्य काम इस ग्रंथ के मुद्रित करने में केवल इतना ही है कि उस के मूलपाठ को सार्थक शोध दें परंतु यह महाकाव्य वर्तमान समय में ऐसी बिगड़ी हुई दशा में उपस्थित है कि जो उस पर इतना परिश्रम न किया जावे कि जितना हम यह करते हैं तो हमारा किया हुआ शोधन पुरातत्त्ववेत्ता विद्वानों को भली भांति संतुष्ट नहीं कर सक्ता । अतएव हम चंद के काव्य की अर्थ संबन्धी कठिनता को दिखलाने के लिये केवल इस मंगलाचरण के रूपक का अर्थ उदाहरण के लिये करते हैं कि जिस से हमारे पाठकों को मालूम हो कि मूलपाठ का शुद्ध होना अर्थ पर दृष्टि दिये बिना असंभव है । महाकवि चंद अपने इस महाकाव्य के आरंभ में इस मंगलाचरण के रूपक में आदिदेव, गुरु, वाणी, लक्ष्मीश, सुरनाथ और सर्वेश को नमस्कार करता; है वह कहता है कि “आदिदेव को नमन कर के और गुरु को नमस्कार करके; वाणी के पादों को वंदन; स्वर्ग, पाताल, (और) पृथ्वी के सृष्टा लक्ष्मीश के चरणों का आश्रय, दुष्टों के दहन करने को तम गुण (जिस) ईश में रहता है (उस) सुरनाथ की पादुका का सेवन (और) थिर, चर, जंगम, (और) जीव के वरदामय सर्वेश को (मैं) चंद नमन करता हूं” । हमारे किये इस अर्थ को विचारने से विद्वानों को मालूम हो सकेगा कि यद्यपि इस के अनेक प्रकार के अर्थ हो सक्त हैं परंतु यह अर्थ चंद के व्याकरण शास्त्र संबन्धी जो नियम उस के इस ग्रंथ से मालूम होते हैं उनके अनुसार सरल और कवि की उक्ति के अनुकूल है । इस में कितनेक शब्द ऐसे २ भी हैं कि जो अर्थ करने वाले को चमका और भड़का देते हैं परंतु हम इस रूपक के सब शब्दों के विषय में अर्थात् जिसके विषय में जितना कहना आवश्यक है वह कहते हैं :- आदिदेव (सं. पु. आदिदेवः । आदौ दीव्यति स्वयं राजते) नारायण । इस शब्द के विषय में हम ने ऊपर कहा है अतएव यहां विशेष नहीं कहते किन्तु उस के प्रयोग के दो प्रमाण और भी यहां देते हैं:-सहस्त्रात्मा मया योव आदिदेव उदाहृतः॥ या. स्मृ. ॥ वासुदेवो बहृद्दानुरादि देवः पुरंदरः ॥ वि. सहस्रनाम.॥