भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 222

२१२ पृथ्वीराजरासौ । [ दसम समय ३२ प्राक्कार धरनि दसकंध हरि । पवन पूत अवधूत अर ॥ सर * करन लंक ल्यावन सती । थप्पन लंक अभीष वर ॥ छंदं ॥ २७१ ॥ रू० ॥ ६६ ॥ बंधि पाज बर बीर । लंघि साइर सु अष्ट कुल ॥ बय तरंग तपि तथ्य । भरे जनु अगस्ति (सु) † अंजुल ॥ सिर मच्छी ऊछरी । मनौ रचि मनि धर सेसं ॥ पिठ राम भर हनुअ । किन्न मन कारन भेसं ॥ चक चकित नाथ दस बेढ पुर । छोरि देव सेवन गय्य ॥ घर लंक सदा थप्पन सुथिर । अगच गहन हनुमंत भय ॥ छंदं ॥ २७२ ॥ रू० ॥ ६७ ॥ जब सु राम चढि लंक । तब सु मच्छी गिर तारिय ॥ जब सु राम चढि लंक । तब सु पथ्थर जल धारिय ॥ जब सु राम चढि लंक । तब सु चक चक्की चाचिय ॥ जब सु राम चढि लंक । तब सु लंका पुर दाचिय ॥ जब राम चढे दल बंनरन । भिरन राम रावन परिय ॥ भिर कुंभ मेघ राषिस रसन । सीत काम कारन करिय ॥ छंदं ॥ २७३ ॥ रू० ॥ ६८ ॥ उतरि समुद्द अथाव्ह । घाव लंका धुर धुज्जिय ॥ चल्लिय सेन रघुवंस । जोर सामंत सु सज्जिय ॥

सायर । कुलं । कुंलं । त्रिप तुरंत तिप तथ । भरै । अंचल । शिर । मच्छी । उबरी । मनौं । मनौ । सैसं । शेसं । पिठ । रांम । कीन । नैसं । चक्रित । वदनपुर । बदपुर । छोरि । देवन यह्य । एह्य । धर । थपन । आग मग । हनमंत ॥ ६७ ॥ रामं । रांम । मच्छी । गिरि । तारिरय । तारीय । रांम । लिंक । पत्थर । धारीय । रांम । चक्की । रांम । दाहीय । रांम । चढै । बंदरन । रांम । परीय । सीन ॥ ६८ ॥ उत्तरि । समुद । धुज्जि । सैन । रघुवंस । जो । ससज्जिय । ससाजिय ।

  • इस शब्द का किसी पुस्तक में सर और किसी में सरु पाठ है । मैं इस का फारसी سر शब्द से हिन्दी का बनना नहीं समझता हूं किन्तु संस्कृत सरः =गतौ । गमने ॥ भेदके । भेदने ॥ अथवा Sk. सरु=Thin, Small, minute. Hence conquest, victory, triumph. के अर्थ में कबि का प्रयोग करना मानता हूं । बहुत से संस्कृत और हिन्दी शब्द ऐसे २ हैं कि जो उच्चारण और अर्थ में फारसी और अरबी भाषाओं के शब्दों से मिलते जुलते हुवे हैं । क्या उन का अन्य देशीय भाषाओं से ही उत्पन्न होना स्वीकार करना परम प्रशंसनीय है ? । † अधिक पाठ ॥