भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 226

२१६ पृथ्वीराजरासौ । [ दसम समय ३६ रिन रत्तौ कुम्भक्रन्न । पत्यौ भूपै वैसन्नर ॥ धर बंदर धक धाव । दन्त करि पट्टे बन्नर ॥ पंष भष पलचरिय । नही लड्डे तिच्छि वारं ॥ खोषि सरित रत धार । पानि लै पिये अपारं * ॥ खा इंत सित्त बंदर सुघट * । गिरन धार उप्पर पत्थौ * ॥ रघुवंस नाम रावन कत्थौ * । करन फहि दावने धत्थौ ॥ कूं० ॥ २८८ ॥ रू० ॥ ७९ ॥ परत खात धर † धरनि । पदम अठ्ठद्द दमि पाखन ॥ जनु कि सह साइरन । आनि प्रथ्थी जर तारन ॥ परिभष्षन रषिषसन । कुइक चीसन मुष सासन ॥ कर सुपिठ (मस लिग ‡) कमंध । भरत मुष इष्यिय भासन ॥ करि लंक कंक पंकन पलन । पञ्चन राम हथ्थी दुतिय ॥ धर धरत नारि कंतन क्रासन । कूटि कूटि दाहन छतिय ॥ कूं० ॥ २८९ ॥ रू० ॥ ८० ॥ त्रिभंगी ॥ गढ खंकक्रनन्दा, अग्गि जरंदा, धाव करंदा, मिलि जंदा । कै जंघक्कंदा, सूपरकंदा, डेढकरंदा, मुष गंदा ॥ पल सव्वन षंदा, बघ्घ चवंदा, आप अनन्दा, § कुर जंदा § । किजकी कूकंदा, माता मंदा, भारी भंदा, जारंदा § ॥ २९१ ॥ परि कुंभ धरंदा, § बान चलंदा, राम कहंदा, मारंदा ! घर रावन रुंदा, करै ति संदा, लषै जंदा, दीसंदा ॥ ७९ पाठान्तर :—रतौ । कुंभक्रनः । भुपै । वैसंनर । वंदर । पद्ये । पधे । भप । पलचरीय । नाहि । लधै । लघेति । सोषि । सरतर । पांनि । ले पिए । पीय । * यह तुकें सं० १७७० की पुस्तक में नहीं हैं । सित । उपर । करनं ॥ ८० पाठान्तर :—† धर शब्द सं० १७७० की पुस्तक में है ही नहीं । अठ । सह । सद । साईरनिः । आंनि । प्रिथी । प्रथी । परिभषन । रषिसन । कौइक । कोइक । चीसनि । शासन । सुपिठ । ‡ “मसलिंग” अथवा “मत्थलिग” अधिक पाठ मालूम होता है । कमध । भिरत । ईषिय । दृषीय । लक्कं । कक । रांम । हथी । दुतीय । क्रसनं । कुटि । कुट्टि । छतीय ॥ ८१ पाठान्तर :—छंद तिभंगी । अगि । के । जंघडकंदा । सुपरकं । सुपरकंदा । दैठकरंदा । संञन । अच्वनं । वध । § यह तुक तथा तुक के टुकड़े बूँदीवाली पुस्तक में नहीं है । आपनइंदा । भट्टा । बांन । बलंदा । रांम । रुदा । रुंदा । करे । सद्दा । लपै । लखे । लषे । राषस । रूपं ।