पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 254, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंहसम समय ६५ ] पृथ्वीराजरासौ । २४५ प्रजा प्रसंखत भेट दधि । चल लिए परसत पग्म ॥ षट गुन प्रभु बलिभद्र सम । हरि मिलि गोचर लग्ग ॥ छं० ४८१ ॥ रू० ॥ १७५ ॥ राज सुराजन मातुलह । मत लहि अतुल अपार ॥ कुवलय गज मुच लय मुदित । विदित वली दरबार * ॥ छं० ॥ ४८२ ॥ रू० ॥ १७६ ॥ दिठि दल दिन बालक विहसि । कुससिय कुसदिव गब्भ ॥ सुन रोचिन रोचित रिसह । दिठ दिग लग्गौ अभ्र ॥ छं० ॥ ४८३ ॥ रू० ॥ १७७ ॥ ब्रज सरनागत बसत व्रज । ब्रज कहि मंगै सग्ग ॥ हम गज दिट्ट निरष्यो । निसष उसारहु पग्ग ॥ छं० ॥ ४८४ ॥ रू० ॥ १७८ ॥ रिस लोचन रन रक्त किय । रक्तंभर ब्रजपाल ॥ रति रत कंस उदंसि सिष । किस पंचित निय काल ॥ छं० ॥ ४८५ ॥ रू० ॥ १७९ ॥ भुजंगी ॥ मदंक्कारि भूरंग रूपं गरज्जं । अहो बाल वालं तिवारं वरज्जं ॥ चयं वाद बहं पयं पीलुवानं । ठिन्नै टह नहे' जुधं जूझं आनं ॥ ४८६ ॥ कटिं पह पीतं सिरं स्याम सेखी । सिता नील दसनाय दसनाय केखी ॥ धरै ओरह्यं सुवज्जंत फूंलं । हसै विक्कसे मुष्य गेनं गद्दलं ॥ ४८७ ॥ गही सुंड सुंडीन षंडी अपारं । नटी जानि बंसी सुचुक्की विचारं ॥ पयं पात भूमी सुभूमी जु आनं । दिठी कंस लग्गी सुबज्जे निसानं ॥ ४८८ ॥ प्रन्जा । प्रसंखंत । भेंट । दधि । सत । पंग । पट्ट । गौचर । लग । १७५ । राजुन । राजन । मातुलह । मतु । कुंबलय । गजु । मुदिता । विदती । १७६ । दिनि । विहसि । गभ । रौहिनि । रौहित । रोदित । लगौ । अभ्र । १७७ । वृज । मंगे । मग । हमन । दिठन । नरपयौ । उधारहु । पग । १७८ । लोचन । रतकियै तक्किये । रतंवर । उदंस । किस । १७९ ॥
- हिं॰ दरबार (सं॰ दर or दरि, A natural or artificial excavation in a mountain, a cave, cavern, a grotto &c. and बार A door-way, a gate.) Hence at door-way or gate. अर्थात द्वार पर ॥ १७