भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 259

२५० पृथ्वीराजरासो । [ दसम समय १० दूहा ॥ छहकारत मल्लिन सुभर । अति बज्र दिन बल बीर ॥ सुर नर नाग निबद्ध नर । भई कुलाचल भीर ॥ छं० ॥ ५३४ ॥ रू० ॥ १८२ ॥ रंसाला ॥ उत्तमल्लं भरी । अत्ति धारं धरी ॥ जांनिमत्ते करी । होइच्छायं षरी ॥ ५३५ ॥ घाय बज्जे घरी । गज्जि भद्दों भरी ॥ मच्छ फछं टरी । भ्रस्म भ्रम्मं धरी ॥ ५३६ ॥ मल्ल झुल्झैँ चरी । वारि खेदं झरी ॥ मेघ लग्गं गिरी । हेम कंपं ठरी ॥ ५३७ ॥ चीय ता कित्तरी । प्रान पक्कै लरी ॥ जानि धक्कै धरी । उन्न उन्नं छरी ॥ ५३८ ॥ धूरि भूमी भरी । डोल लग्गी ढरी ॥ श्रोन सुष्षं झरी । द्रोन द्रुग्गं षरी ॥ ५३६ ॥ मुट्ठ चुक्कं परी । राम कामं हरी ॥ मल्ल भूमं परी । कंस चासं डरी ॥ ५४० ॥ मंच मुक्की मुरी । धाय जहं धरी ॥ केस पंचे करी । * * ॥ छं० ॥ ५४१ ॥ रू० ॥ १८३ ॥ दूहा ॥ सत्तपुत्त बंधवं सपत । लब्ध असी गनि भृत्त ॥ काम आय बलिभद्र कर । कन्द कंस नव छत्त † ॥ छं० ॥ ५४२ ॥ रू० ॥ १८४ ॥ कवित्त ॥ राति कंस सुपनंत । कंध दिष्यौ न कंध पर ॥ षर ग्रिद्धव उच्चार । षोज लख्यै न अंग उर ॥ चिन्ह चीन तन चित्त । बीर जग्ग्यौ भ्रम षंडे ॥ मुकति बंस मति छीन । रंग मंडप फिरि मंडे ॥ चानूर बीर मुष्टिक बलिय । तोसलहच रन रंग सजि ॥ कलि काल मल्ल कलि काल गति । कलिय काल भंजन सुरजि ॥ छं० ॥ ५४३ ॥ रू० ॥ १८५ ॥ गने । जंम्म । बंधि । विधि । छिर । छह । उपारै । पगं । ब्रह्मन्ध । जगं । दिषिय । लषिय । भषिय । उभानं । चंपय । उछलारहि । डोरीय । छिन हंसं ॥ १८२ पाठान्तरः—हहकारति । मलनि । १८३ पाठान्तरः—मलं । अति । अधि । दुरी । करी । धुरी । मद्ध । मल । झुभैं । कितरी । प्रांन । पक्कैं । जांनि धकै । उन । उनं । दुगं । मुठ । चुकं । भरी । मरी । मुक्की । यह्वै । * * मेरे पास की किसी पुस्तक में पाठ नहीं ॥ १८४ पाठान्तरः-सत । पुतं । भत । कांम हत ॥ † यह रूपक सं० १६४७ की लिखित पुस्तक में नहीं है और उसके पीछे का सं० १८५८ की में है ॥ १८५ पाठान्तर :-गृंधव । उचार । मुगति । चाणूर । मुष्टिक । तोसलह ॥ :