पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 260, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशम समय ७१ ] पृथ्वीराजरासो । २५१ दूहा ॥ जसुन सपत्तौ कंस हति । विस्व विराजत साथ ॥ वर विश्राम विश्राम घट । धनि जदुनाथ सुघाथ ॥ छं० ॥ ५४४ ॥ रु० ॥ १८६ ॥ अरिल्ल ॥ मल्लहिन मारि पछारति कंसह । बंधव के रिपु केरि पुनंसह ॥ सूरसेन पुत्तिय सुत खंडिय । उग्रसेन सिर छत्रह मंडिय ॥ ५४५ ॥ जनम धाम वसुदेव देवकिय । किय वरपान प्रसन्न अंसु किय ॥ विप्रदान ग्रहगान सुमंडिय । कवि कविचंद द्वंद मुष वंदिय ॥ छं० ॥ ५४६ ॥ रु० ॥ १८७ ॥ दूहा ॥ हत्यौ कंस केसी हत्यौ । कालयघित जिन मात ॥ नंद कह्यो नन्दादि सौं । जाहु गेह अब तात ॥ छं० ॥ ५४७ ॥ जननि जसोदा सौं कह्यो । राम किस संदेस ॥ ह्यां दधि मांपन चोरते । ह्यां हत कंस नरेस ॥ छं० ॥ ५४८ ॥ गोधन गोपी ग्वाल सब । सुष रचियो ब्रज वास ॥ दिन दस पाछें आय हैं । मात जसोदा पास ॥ छं० ॥ ५४८ ॥ वंसी वेत वषांन वन । गेंद चींगुरी जोरि ॥ धरियो सबै दुराय कै । लेइ न राधा चोरि ॥ छं० ॥ ५५० ॥ अंसुधार अँसुरार मुष । परत नंद सब गोप ॥ जो छांडे अब दीन करि । कतराषे जन कोप ॥ छं० ॥ ५५१ ॥ अघ बक धेनक चासतें । अरु दावानल पान ॥ कतराषे इन विघ्ननतें । जमला अरजुन ठान ॥ छं० ॥ ५५२ ॥ इह कहि सब अंकन मिले । नंद गोप सब साथ ॥ पगन परत ब्रज जात मग । कहत सनाथ अनाथ ॥ छं० ॥ ५५३ ॥ डग मगि पग पेंडन चले । फिरि चितवै गोपाल ॥ का जाइ जसोदा कहैं । बिना संग ब्रजलाल ॥ छं० ॥ ५५४ ॥ जाइ जसोदा सों कह्यो । रहे राम बलबीर ॥ सुनत जसोदा यों टरी । ज्यों तरु काटे नीर ॥ ५५५ ॥ गोपी गोप गुपाल बिन । यों दीषत दीनंग ॥ १८६ पाठान्तरः-संयत्तौ । विश्व । विश्रांम । १८७ पाठान्तरः-मलन । जरासिंध । पुतिय । धांम । देवकीय । पांन । अंशु । गृह गाम ॥