भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 261

२५२ पृथ्वीराजरासौ । [ दशम समय ७२ कहूं न सन माने निमष । ज्यों मनि बिना भुयंग ॥ छं० ॥ ५५६ ॥ लद माषन साटौ दधी । धयो रहै मनमंद ॥ षाइन बिन गोपाल को । दुषित जसोदा नंद ॥ छं० ॥ ५५७ ॥ प्रभुमाया फेरी प्रबल । सब लागे गृह दंद ॥ पलन सुहाई राधिका । बिन वृंदावन चंद ॥ छं० ॥ ५५८ ॥ दूहा ॥ घर अंगन गायन फिरकि । जमुना जल बन कुंज ॥ फिरत उचाटी सी भई । बिन वृंदाबन चंद ॥ छं० ॥ ५५६ ॥ वंसीबट बनबीथिकनि । दधि रोकन की ठौर ॥ नैकु न मानै कहुं न मन । कह्यो कहा जौं और ॥ छं० ॥ ५६० ॥ लीला ललित सुरार की । सुक मुनि कही अपार ॥ ते बड भागी देव नर । जपत रहत नित्यार ॥ छं० ॥ ५६१ ॥ नंद तात पत्तौ सु ग्रह । सिसु बसुदेव प्रमान ॥ कोइ काज मथुरा सु बसि । चलि दारिका निधान ॥ छं० ॥ ५६२ ॥ मधु मंडित मधु पूरित मधु । मधु माधुर सु अजोग ॥ कवि बरनिय सुरस्वामि को । कहत दसम संभोग ॥ छं० ॥ ५६३ ॥ रु० ॥ १६८ ॥ जुतिचाल ॥ बाले जसोदा मतिलोले । कंस कालेसुकाले ॥ जसोमति नंदो गोप बंदौ । कंदो गुट्ठिगे बाल चेंदौ ॥ दीन बंदो न बंदौ । जयौ बासुदेव नन्दा ॥ छं० ॥ ५६४ ॥ रु० ॥ १६६ ॥ ॥ बौद्धावतार की कथा ॥ दूहा ॥ उतपन कैकट * देस कलि । असुर जग्य जय हारि ॥ जय जय बुद्ध सरूप सजि । है सुर सिद्धि सुधार ॥ छं० ॥ ५६५ ॥ रु० ॥ २०० ॥ १६८ पाठान्तरः-सैं ॥ ५४७ ॥ सुं । मायौ ॥ ५४८ ॥ रहीयो । पाछैं । आदहौ ॥ ५४६ ॥ घट । गिंद । हिंगूरी । हिगुरी ॥ ५५० ॥ असुरार । असरार । छांडैं ॥ ५५१ ॥ पांन । ठांन ॥ ५५२ ॥ कहा । कहै । छिना ॥ ५५३ ॥ सैं । यौं ॥ ५५५ ॥ विन । दिषत । हीनंग । निपम । बिना ॥ ५५६ ॥ सांपन । विन ॥ ५५७ ॥ फेरि । बृंदाबन ॥ ५५८ ॥ परखि । बन ॥ ५५६ ॥ नैकुं । लौं ॥ ५६० ॥ नित्यार ॥ ५६१ ॥ पत्तौ । प्रमांण । निधांन् ॥ ५६२ ॥ स्वांमि । कों ॥ ५६३ ॥ २०० पाठान्तर । ककट । किकट ॥

  • श्रीमद्भागवत पुराण में बुद्धकी उत्पत्ति "कीकट" में होनी लिखी है:-