पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा समय ० ] पृथ्वीराजरासो । ०६१ आराधन वर ग्यान, होइ संसार मुषादौ । दैवक्रम करि जोग, सोइ पाषान उपाट्यौ ॥ रुधि डंक त्रुटिट संमुह चलिय, अति अद्भुत सु दिप्पियौ । परिगह प्रवास मंची नृपति इन आचिज्ज सु लप्पियौ। छं० ॥ २४ रु० ॥ २४॥ पाषाण का उखाड़ लेना सुन व्यास का दुःखित हो राजा के पास आना ॥ दूह्रा ॥ सुनि आयौ वर व्यास तँह, दुष पायौ मन मस्झ । का जंप्यौ सुप नृपति सौं, इह मति मूढ अबुझ्झ ॥ छं० ॥ २५ ॥ रु० ॥ २५ ॥ अनंगपाल का पश्चाताप करना और व्यास का आगम कहना ॥ कवित्त ॥ अनंगपाल चक्कवै, बुद्धि जो इसी उकिल्लिय । भयौ तुअर मति चीन, करी किल्लीय तैं ढिल्लिय ॥ कहै व्यास जग जोति, अगम आगम हौं जानों । तूंअर तैं चहुआन, अंत व्हैहै तुरकानों ॥ तूंअर सु अवनि मंडव घरह, इक्क राय वन्नि विक्कवै । नव सत्त अंत मेवात पति, इक्क छत्र मच्चि चक्कवै ॥ छं० ॥ २६ ॥ रु० ॥ २६॥ व्यास का अनंगपाल को खेद न करने का उपदेश करना ॥ पद्धरी ॥ उच्चरयौ व्यास जग जोति वीर । मृत सुग्गं लोक पाताल नीर । चयकान दरस दरसिय सु देव । व्यासद्द समान जोतिगिय तेव ॥ छं० ॥ २७ संसार सार अस्सार कीन । वर व्यास बुद्धि कोविद्द प्रवीन ॥ मंडयौ सु राज सौं क्रोध नूप । बरज्यौ सुकिष्ण व्यासद्द सरूप ॥ छं० ॥ २८ ॥ २४ पाठान्तर-अनंगपाल । प्रथवी । अचरिज । वत । होइ । सोइ । सांख्यौ । ग्यान । सोय । सोइ । चलोय । अदभूत । दिपियै । परिगृह । नृपति । आचिज । लिपियै ॥ २५ पाठान्तर-तहां । तह । संझ । नृपति । सों । मूढ मति अससंझ ॥ २६ पाठान्तरः- अनंगपाल । यती । उक्तिलिय । भय । तौंअर । तैं । ढिल्लीय । किल्लाय । हूं जानै। तोअर । तैं । चहुवानं । हू हैं । होइ है । तुरक । इक । राइ । बिक्कवै । अंति । मनि । इक । छत्र०। चक्ववै ॥ २७ पाठान्तर-उच्चयो । मत । स्वर्ग । समांन । जोग्गी । असार । बुधि । सौ ॥ २८ जनमेज । मत । मांन । आंनी । थ्यान ॥