भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 269

२६० पृथ्वीराजरासो। [तीसरा समय ६ ग्राम नाम अप्पियै, कुसल जिन होय ग्रेह धन ॥ चिंतयौ चित्त दुजराज तब, अगम निगम करि कढ्ढयौ । सुभ घरी मूरत संधि कैं, फिरि पाषान सु गढ्ढयौ* छंदं० ॥ २० ॥ रु० ॥ २० व्यास का कहना कि पांच घड़ी तक पाषाण को हाथ न लगाने से वह शेष के सिर पर दृढ हो जायगा परन्तु राजा का इसे अनर्थ कर मानना ॥ कवित्त ॥ कहै व्यास जग जोति, सुनहि तूंवर नरिंद तुअ । एह सेस सिर गाव, अंचल निहचल सुरंग धुअ ॥ सोचि अरथ पल पह, केह अप्प नह राजन । पंच घरी इह मुक्कि, राज रचिये इन काजन ॥ इतनौ जु कह्यौ वर व्यास तहँ, इन अनत्थ का मानयौ । भवक्त्तिबत्त मिहै न को, क्त कर्म नह जानयो ॥ छंदं० ॥ २१ ॥ रु० ॥ २१ साठ अंगुल की कीली गाड़ना अर्थात् शंकुपात कर्म करना ॥ अरिल्ल ॥ सुनी बत्त इह तत्त प्रमानं, व्यास करी किल्ली पुर†थानं । साठि सु अंगुल लोहय किल्लिय, सुकर सेस नागन सिर मल्लिय ॥ छंदं० ॥ २२ ॥ रु० ॥ २२ ॥ सब के बरजने पर भी उस कीली को उखाड़ डालना ॥ अरिल्ल ॥ मुंध लोइ आचिज्ज सु मान्यौ, भावी गति सो व्यास न जान्यौ । बरजे सब परिगह परिमानं, उच्चारी कील्ली भू थानं ॥ छंदं ॥ २३ रु २३ पाषाण के उखाड़तेही रुधिर की धार चलना और आश्चर्य्य होना ॥ कवित्त ॥ अनंगपाल पृथ्वी, नरेस आचिज्ज सु मान्यौ । भवसि बत्त जो होय, सोय ब्रह्मान न जान्यौ ॥

  • “फिर पाषान सुगढ्ढयो” अर्थात वास्तुशास्त्रानुसार शिलान्यास कर्म किया ॥ २१ पाठान्तर-तूंअर । शेष । फिर । निश्चल । धुय । दक । मुक्ति । सु । तहां । अनथ । मांनयौ । कौं । मिट्टै । कृत । क्रम । जांनयौ ॥ २२ पाठान्तर-बत्त । प्रमांनं । किल्लीपुर । किलीय । मिलिय ॥ † अनंगपाल के समय का दिल्ली का नाम “किल्लीपुर” ॥ २३ पाठान्तर-लोय । अचरिज । मान्यौ । जान्यौ । बर्जे । सब । उपारिय । किल्लीय ॥