पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 268, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा समय ५ ] पृथ्वीराजरासो । २५६ वहां कल्हन का कल्हनपुर बसा कर राज करना और फिर उसके कितनीक पीढ़ी पीछे अनंगपाल का होना ॥ दूहा ॥ कल्हनपुर * कल्हन नृपति, बामी नृप निज साज । कितक पाट अंतर नृपति, अनगपाल भय राज ॥ कूं० ॥ १७ ॥ रू० ॥ १७ ॥ इतनी कथा सुनकर राव ( पृथ्वीराज ) के मन में अचरज हुआ ॥ दूहा ॥ सुनत राव इह कथ्य फुनि, उपजयि अचरज अंग । निश्चल अंग धीरज रचित, भयो दुमति मति पंग ॥ कूं० ॥ १८ ॥ रू० ॥ १८ ॥ विपरीत समय का आना देखकर सकल सभा का शंकित होना ॥ दूहा ॥ सकल सभा संकित भई, व्यास वयन वर वेद । क्रमयं समय विपरीत भय, उपज्यो अंतर भेद ॥ कूं० १८ ॥ रू० ॥ १८ ॥ † दूसरी किल्ली की कथा ॥ अनंगपाल की पुत्री का अपने पुत्र (पृथ्वीराज) के आगे अपने पिता के फिर से दिल्ली बसाने के लिये पाषाण और किल्ली गाड़ने की कथा का कहना ॥ कवित्त ॥ अनगपाल पुत्तीय, फेरि बुल्ली सुत सम्मुख । एह बत्त आचिञ्ज, उपजि मो पित्त तु तव्वह ॥ पृच्छि व्यास ‡ जग जोति, राज मंचौ उक्वव घन § । १७ पाठान्तर-किल्हनपुर । किल्हन । अनंगपाल । भयो ॥
- कल्हन राजा के दिल्ली बसाने के समय का दिल्ली का पुराना नाम कल्हनपुर है ॥ १८ पाठान्तर-कथ । अचरिज ॥ १९ पाठान्तर-बंचन । विपरति ॥ † ध्यान में रहे कि कल्हन के पीछे कई पीढ़ी तक तँवर कल्हनपुर में सुख से राज करते रहे और रूपक-१८ और १९ कवि ने दूसरी किल्ली की कथा का प्रसंग मिलाने के लिये कहे हैं। क्योंकि जो कुछ विपरीत हुआ है वह दूसरी किल्ली के पीछे हुआ है ॥ २० पाठान्तर-अनंगपाल । पुत्रीय । बोली । संमुख । बत । आचिज । पित । तवह । पुद्धि । व्यास । उक्तव । नांम । कुशल । सह्नि । गढयो ॥ ‡ अनंगपाल के समय का राजगुरु ॥ § इससे स्पष्ट है कि अनंगपाल ने दूसरी वार दिल्ली बसाने का प्रयत्न संतान की कामना से किया था । इसी लिये कवि ने-याम नाम आंपिये, कुसल जिन होय यह धन-कहा है । और "धन" शब्द यहां सन्तान का वाचक है ॥