पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५८ पृथ्वीराजरासो । [ ताँवरो समय ४ ज्योतिषियों को विदा कर माता और पुत्र का एक गृह में जा बैठना ॥ दूहा ॥ न इह कथ्थ दुजराज कथि, प्रनमि करी सु विदाय । मात पुत्त दो इक्क गृह, बरतति बैठे आय ॥ छं० ॥ १४ ॥ रु० ॥ १४ ॥ अनंगपाल की पुत्री का अपने पुत्र के आगे दिल्ली की पहली किल्ली की पूर्वकथा का कहना और राजा कल्हन का वनक्रीडा करते सुसा और स्वान के चरित्र से भूमि का वीरत्व देखना ॥ कवित्त ॥ तब अनगानी पुत्ति, कहै सुनि पुत्त सु वत्तह । पुब्ब कथां ज्यौं भई, सुनौ त्यौ कहूं अपुब्बह ॥ इम पितु पुरिषा पुब्ब, नृपति कल्हन* वन क्रीडत । सुसा छंडि ता पुट्ट, स्वान संचरिय सचीलत ॥ सिसु संमुख हुइ बैठी सु तहां, अग्गि स्वान भै भीत हुअ । सब सभ्य तथ्य आचिज्झ भय, करि पारस ठड्ढे सुभय ॥ छं० ॥ १५ ॥ रु० ॥ १५ ॥ उस वीरभूमि में व्यास का कीली गाड़ना ॥ दूहा ॥ व्यास † जोति जग जोति तहँ, सिद्ध महूरत ताव । दैव जोग सेसच्च सिरह, किल्ल किल्लित सु ग्राव ॥ छं० ॥ १६ ॥ रु० ॥ १६ ॥ १४ पाठान्तर—नह । कथ । विदाय । पुत । दोइ । इक । यह । बैठ । आइ ॥ १५ पाठान्तर—पुत्रि । कैह । पुत्रि । पुत्र । वतह । ज्यों । सुनौ । तूं । कहौं । पित्त । पुर्वि किल्हन । स्वांन । सचीलति । सव्वीलत । समुष । होय । होइ । बैठौज । स्वांन । श्वान । भय । होइ । सभ । तथ । आजिज । ठट्ठे ॥ * कल्हन चन्द्र का वाचक होने से राजा चन्द्र । उपसं- हरणी टिप्पण देखो ॥ १६ पाठान्तर—दैवयोग । सिरनि । कील । कलित ॥ † व्यास राजगुरु का वाचक है । तँवर राजपूतों के पांडववंशीय गिने जाने से उनके राजगुरु व्यास कहाते थे । यह वह व्यास था जो कल्हन राजा के समय में राजगुरु था ॥