भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 266

तीसरा समय ३ ] पृथ्वीराजरासो । २५७ सुपर्नंतर चहुवान, जाय जुग्गिनिपुर मंडिय ॥ जाग्रंत सात दिप्यो सुपन, प्रकृत्ति न कोय तिन थान रद्दि । भय प्रात मात पुच्छिय प्रगट, सो सुपर्नंतर अरथ कहि ॥ छं० ॥ ९ ॥ रू० ॥ ९ ॥ पृथ्वीराज की माता का स्वप्न का वृत्तान्त सुन अद्भुत रस में रंजित होना ॥ अरिल्ल ॥ सुनि सुनि बचन मात तब बुझिय, सुभ अद्भुत चित्तरस झुझिय । सुप दृप द्रिग्ग भरी जन आइय, मन भौ चास कहन फुनि आइय ॥ छं० ॥ १० ॥ रू० ॥ १० ॥ उसका ज्योतिषियों को बुला स्वप्न का सत्यफल पूछना ॥ दूहा ॥ तब बुलाय सब जोग्गी, कहो सुपनफल सत्य । दिवस पंच के अंतरे, होय सु दिल्लीपत्ति ॥ छं० ॥ ११ ॥ रू० ॥ ११ ॥ गाथा ॥ ढिल्ली वै स्वपनं तं, प्रातं कत्थिय* प्रगट विप्रायं । जोतिग गनिक गुनीसं, सुनियं ते। सत्ति रुत्तार्यं ॥ छं० ॥ १२ ॥ रू० ॥ १२ ॥ ज्योतिषियों का उत्तर दे कहना कि पृथ्वीराज दिल्ली का राजा होगा ॥ दूहा ॥ न इह बात जोतिग घटै, मनसु धुच्च थिरताव । जोग नेर† जोतिग कहै, प्रभु सु होय प्रथुराव ॥ छं० ॥ १३ ॥ रू० ॥ १३ ॥ ९ पाठान्तर-कवित्त षट्पद । जुगिनि । *सुरंग । शृङ्गार । अभ्यास्यि । तारक (कै) अधिक पाठ है । भांन । महापीय । उच्चार । बानी । मंदीय । चहुवांन । चहुआन । जाइ । जोगिनपुर । कुंडिय । जाग्रन । मंत्र । दिब्यौ । सुपनः । प्रकृत । कोइ । पुंछि । सुपनंतर । अर्थ ॥ १० पाठान्तर-बचन । चित्त । झुलिय । द्विग् । भरि । भए ॥ ११ पाठान्तर-बुलाय । बुजाइ । जेतषी । कहि । कहै । सति । कहै । होइ । दिल्ली । पति ॥ १२ पाठान्तर-ऊहीय । * यहां “गाथा” पाठ सं० १८५६ ली. पुस्तक में अधिक हैं। विप्रायं । सति । मता ॥ १३ पाठान्तर-नह । बात । म॑निसु । धुच्च । जोगनयर । जोतिषि । होइ । एथुराज ॥ † दिल्ली का पुराना नाम ॥