पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५६ पृथ्वीराजरासो [ तीसरा समय २ बालकपन में पृथ्वीराज का दिल्ली प्राप्त करने का स्वप्न देखना ॥ दूहा ॥ बालपन प्रथिराज ने, दृढ सुपनन्तर चिन्ह । लै जुग्गिनि जुग्गिनि पुरह*, तिलेक अच्छ करि दिन्ह ॥ छं० ॥ ३ ॥ रू० ॥ ३ ॥ कछु सोवत कछु जागते, निसि सुपनंतर पाय । अद्ध रयन के अंतरै, सुष सुत्तच सुभदाय ॥ छं० ॥ ४ ॥ रू० ॥ ४ ॥ अभयदायिनी नाम तिहिं, जुग्गिनि जग आधार । सुपनंतर सुभदायिनी, आयै आप पधार ॥ छं० ॥ ५ ॥ रू० ॥ ५ ॥ कनक कंत्ति दुति चंग की, निरषि सु पातग जात । परमानन्दप्रदायिनी, पार करन जग मात ॥ छं० ॥ ६ ॥ रू० ॥ ६ ॥ नष सिष प्रभा प्रकास दुति, चंद सुष कमल सुफूल । बरन बरन नग जोति जग, जरकस कंत्ति दुकूल ॥ छं० ॥ ७ ॥ रू० ॥ ७ ॥ पृथ्वीराज की माता का उससे स्वप्न का वृत्तान्त पूछना ॥ दूहा ॥ सुंपन पुच्छि माता तबै, कहौ पुत्र सब भाय । जो दिष्यिय तुम अई निसि, सो कारन समझाय ॥ छं० ॥ ८ ॥ रू० ॥ ८ ॥ पृथ्वीराज का माता को उत्तर दे स्वप्न का वृत्तान्त कहना ॥ कवित्त ॥ करि जुग्गिनी रत भेस, सुरंग सिंगार अभासिय । चंद पंक्ति तारक्क, चरन परि बिंटि प्रहासिय ॥ अंबर दिय उच्चार, दिव्य बानी धुनि मंडिय । ध्यान में रहे कि यहां से सब कथा चंद और उसकी स्त्री के संवाद में है और उस संवाद के अंतर्गत अन्य सब संवाद वर्णन किए गए हैं, अतएव छंदो का लगाना कुछ गूढ सा हो गया है। निदान हमारे दिए शीर्षकों के बल से अर्थ सुगमता से लग सकता है ॥ ३-७ पाठान्तर-बालपन । पृथ्वीराज । निसि । जुगिनि । जुगिनिपुरह । हथ ॥ ३ ॥ निशि । पाइ । अध । रयनिकै । सुभ सुत्तै सुभदाइ ॥ ४ ॥ अभैदायिनी । तिहि । जुगिन । सुभ- दायिनी । आपै ॥ ५ ॥ अंगसह । पातक्र ॥ ६ ॥ सफूल । सुफूति । बरन बरन नंग । जर्कस ॥ ७ ॥ इनमें सं० १६४७ की लिखित पुस्तक के अनुसार दोहा ६ और ७ का पाठ है, परन्तु, उसके इधर की लिखी नवीन पुस्तको में उनके पहिले पाद तो ऐसे ही हैं, किन्तु शेष तीन पाद ६ के ७ में और ७ के ६ में लिखे मिलते हैं ॥ * जुग्गिनिपुरह-दिल्ली का एक पुराना नाम है ॥ ८ पाठान्तर-सुपिन । पुद्धि । कहौ । कहह्या । समभाय । सबभाडू । दिषियं । दिष्यवि । समुझाइ ॥