पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ दिल्ली किल्ली कथा लिख्यते । (द्वितीय समय) —————— मंगलाचरण । चंद की अपनी स्त्री के प्रति उक्ति कि विधना ने दिल्ली सोमेसरनंद के बसने को निर्माण की है ॥ साटक ॥ राजं जा अजमेर केलि कलयं, वंदं व्रतं संभरी । जुद्धारा भर भीर मीर वचनो, दहनो दुरंगो अरी ॥ सो सोमेसरनंद दंड गछिला, वच्छिला वनं * वासनं । निम्मानं विधना सुजान कविना, दिल्हीपुरं वासनं ॥ छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥ चंद का अपनी स्त्री को कहना कि अनंगपाल की पुत्री को पुत्र उत्पन्न होने से दिल्ली की पूर्व कथा का प्रसंग प्राप्त हुआ है ॥ कवित्त ॥ अनगपाल पुत्तीय सुरँग †, पुत्त इच्छा फल दिन्नौ । नारिकेर फल सुफल, संत आरंभन किन्नौ ॥ तब प्रसाद उप्पन्नौ, पुब्ब संडो कथ भारिय । बर बीसल वै बंस, कह्यौ वर द्रुग्ग विचारिय ॥ पृथिराज जोति बरनीह कवि, अस्तिमंत सामंत भर । चंदानि बदनि सुनि चंदमति, भयौ दानवी बंसवर ॥ छं०॥२॥ रू० ॥२॥ —————————————————————————————————— १ पाठान्तर–बच्छिला । बासन । सुजांन । बासनं ॥ विदित रहे कि यहां कवि ने किसी देवता का मंगलाचरण न कर के पदार्थनिर्देशवत् मंगलाचरण किया है ॥ * जहां दिल्ली बसी है उस बन का पुराना नाम है । २ पाठान्तर–†अधिक पाठ है । पुत्र । इच्छा । दीनौ । कीनौ । प्रशादं । रूपनौ । चारिय । वै । दुग्ग । विचारीय । प्रथीराज । अस्तमंत । दानव ॥