भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 470 में से

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पृष्ठ 273

२६२ पृथ्वीराजरासो । [तीसरा समय ८ जनमैज राज तस मत्त मान। आनो न चित्त तिन निमष ग्यान ॥ क्षिति राज सरिस रिष राइ बोलि। कीनीय बत्त तुम गत्त खोलि॥छं०॥२८ हूं गड्डि गयौ किल्ली सजीव। इछाय करी ढिल्ली सईव ॥ तुंअर अवहि संडव सुथान। भोगवै भूमि सुरतान पान ॥ छं० ॥ ३० ॥ सो मत्ति जानि तुंअर चिनेत्त । मति करै रोस राजन सुचेत ॥ जान्यौ सु कह्यौ बर व्यास रूप । झूटी सु बत्त बरजित्त भूप ॥ छं० ॥ ३१ ॥ हिन्दून् † जानि पंडव सु वंस । तिन भयौ अंस पारत्थ नंस ॥ तिहि वंस भीम अरु भ्रम्म सुत्त । तिहि वंस बली अनगेस तुत्त ॥ छं० ॥ ३२ मति करहु सोच सम संच मानि । हुअ राज काज वर चहुवान ॥ बर वंस सुमति अति मति प्रताप । दिन कितक तपै चहुवान आप ॥ छं० ॥ ३३ ॥ फिरि व्यास कहै सुनि अनग राइ । भवतव्य बात मेटी न जाय ॥ रघुनाथ हाथ त्रैलोक देव । ते कनक म्रग्ग आगे पछेव ॥ छं० ॥ ३४ ॥

  • ये दोनो पाद सं० १५४७ की लिखित पुस्तक में नहीं है और उसके इधर की संवत् १८५६ की में हैं ॥ २८ ॥ हुं । क्रिलि । किली । गड़ि । हलाप । ढिली । इव । तुंअर । अवंटि । सुथांन । सुरतानं । पांन ॥ ३० ॥ मति । जांनि । तोंअर । जांन्यौ । झूठी । स । वरदत्ति ॥ ३१ ॥ जांनि । पारथ । धूम्म सुत । वमं । वली । तुत ॥ ३२ पाठान्तर-मांनि । हुय । चाहुआनं । चाहुवांन ॥ ३३ ॥ राय । मृग । लगे ॥ ३४ ॥ † इस महाकाव्य में “हिन्दू” शब्द यहां पर आया है । उसकी व्युत्पत्ति वाचस्पत्य बृहतसंस्कृताभिधानकर्त्ता और शब्दकल्पद्रुमवाले ने पुंल्लिङ्ग में यह की है- “हीनं दूषयतीति । दुष+डुः पृषोदरादित्वात् साधुः । जातिभेदे । जातिविशेषः ॥” और उसका प्रयोग मेरुतंत्र में यह दिखाया है- पश्चिमाम्नायमंत्रास्तु प्रोक्ताःपारस्यभाषया । अष्टोत्तरशताशीतिर्येषां संसाधनात् कलौ ॥ पंच खानाः सप्तमीरा नव शाहा महाबलाः । हिन्दुधर्म्मप्रलोप्तारो जायन्ते चक्रवर्त्तिनः ॥ हीनं च दूषयत्येन हिन्दुरित्युच्यते प्रिये ! मेरुतन्द्रे २३ प्र० ॥ और भविष्यपुराण के प्रतिसर्गपर्व्व के तृतीय खंड के दूसरे अध्याय में लिखा है कि विक्र- मादित्य के पौत्र शालिवाहन ने पितृराज्य पाने पर शकादि को जीत कर आर्य्यदेश और म्लेच्छ- देश की सीमा इस प्रकार से स्थापित कीं- एतस्मिन्नन्तरे तत्र शालिवाहन भूपतिः ॥ १७ ॥ विक्रमादित्यपौत्रश्च पिताराज्यं गृहीतवान् ॥ जित्वा शकांन्दूराधर्षींश्चीनतैत्तिरिदेशजान् ॥ १८ ॥ बाल्हीकान्कामरूपांश्च रोमजान्खुरजांछठान् ॥ तेषां कोषां गृहीत्वा च दंडयोग्यानकारयत् ॥ १६ ॥ स्थापिता तेन मर्यांदा म्लेच्छार्य्याणां पृथक् पृथक् ॥
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 273, कुल 470 में से · BharatKosha