पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 274, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा समय ६] पृथ्थीराजरासो । २६३ मारीच अप्य आवै छरन्न । दुइ दोन चार सीता हरन्न ॥ पंडवन जाग आरंभ कीन । वरज्यो सु व्यास पंडित प्रवीन ॥ छं० ॥ ३५ ॥ दुरवास दारिका दिषन आइ । जदवन बान्न संह्यौ उपाइ ॥ करि पुरुष नारि रचि गर्भ घास । कछ देव याचि उपजै सु आस ॥ धिजि कछी विप्र तस उदर जोइ । जदवन वंस नष्यै सु षोइ ॥ वरजे सुअम्भ सुत रमन जूप । देषंत अंध ते परे कूप ॥ ३७ ॥ केतेक कद्यौ सुनि अनंग राइ । जानति जान कीनौ उपाय ॥ भवतव्य बात उतपात मोटि । मिटै न बुद्धि कोइ करौ कोटि.॥ ३८ ॥ जिन करौ भेद उपदेस मोहि । धौं जानि ग्यान इछ कद्यौ तोहि ॥ करि घरा भ्रम्म उद्धारि देह । संसार अनित्त छंडौ सनेह ॥ ३९ ॥ द्वैलोक जीत्ति जिन जेरं कीन । ते गये अंत हुइ आपु छीन ॥ फूक गल्ह अमर संसार सार । रप्पै न पहुमि ते बड़ गमार ॥ छं० ॥ ४० ॥ रू० ॥ २७ ॥ सिंधुस्थानमितिज्ञेयं राष्ट्रमार्यस्य चोत्तमम् ॥ २० ॥ म्लेच्छस्थानं परंसिंधोः कृतं तेन महात्मना ॥ २१ ॥ यदि यह माननीय है तो स्पष्ट है कि "हिंदु" शब्द तो "सिंधु" का और "हिन्दुस्थान" शब्द "सिंधुस्थान" का अपभ्रष्ट है अर्थात् वह यावनी नहीं है। यदि उनको यावनी भी मानें तो भी तो आजकल हमारे देश में बड़ी ही प्रबलता से यह माना जाता है कि संसार भर की सब भाषा हमारी संस्कृत से ही निकली हैं। अत एव फिर हम को बतलाना पड़ेगा कि यावनी "हिंदु" शब्द किस संस्कृत शब्द का अपभ्रष्ट है? और जब वह संस्कृत का अपभ्रष्ट है तो फिर उससे घृणा क्यों करनी चाहिये ? तथा हमारे दिये इस प्रमाण से पुरातत्ववेत्ता विद्वानों के विचारार्थ एक यह प्रश्न भी उपस्थित होता रहे कि इससे तो शालिवाहन का विक्रम का पोता होना विदित होता है और अन्य शोधों के अनुसार प्रचलित शालवाहन शककर्त्ता कनिष्क नामक सिदियन राजा माना जाता है। हमारी देशीसाक्षी से विक्रम और उसके पोते शालवाहन का १३५ वर्ष का अंतर असंभव होना प्रतीत नहीं होता है। इस के अतिरिक्त शालवाहन का बौद्ध हो जाना भी कहा जाता है और शक भी बौद्ध धर्म्मावलंबी माने जाते हैं। क्या आश्चर्य है कि यह शालवाहन ही शक धर्मावलंबी हो कर कनिष्क नामक राजा हो गया हो और हमारे यहां उसके पहिले नाम से ही शक प्रख्यात चला आया हो ? पाठान्तर-अप । होइ । होय होनहार । जाय ॥ ३५ ॥ द्विषिन । आय । जदखन । उपाय । कद्यौ ॥ ३६ ॥ जदखन । नंषिय । अंत ॥ ३७ ॥ कह्यों । अनंगराइ । जानंत । जांनि । जान । कीनसु । मौट । मिटै । बुधि । को । कोट ॥ ३८ ॥ उपदेश । हूं । झांनि । धर्म्म । उद्धारि । छंदो ॥ ३९ ॥ जोर । तेउ । गए । होइ । रखै । पहमि । गवार ॥ ४० ॥ २