भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 275

२६४ पृथ्वीराजरासो । [तीसरा समय १० अनंगपाल के पीछे जो जो दिल्ली के राजा होंगे उनके विषय में व्यास का भविष्य कथन करना ॥ तुँअरों का नाश और चौहानों का राज्य होगा ॥ कवित्त ॥ सुनि अनगेस नरेस, सोचि इह आगम बुझै । अंत राज चहुबान, सोचि इह बेगो सुझै ॥ सब तूंअर पग मग्ग, भिरिंग मंडव आहुहै । सार धार धर भूमि, सुगति पय बंधन कुहै ॥ इह दोस राज दिज्जै नहीं, मैं बहु बार बरज्जियौ । भवतव्य बात मिहैं न को, होइ सु ब्रह्म सिरज्जियौ ॥ छं० ॥ ४१ ॥ रु० ॥ २८ ॥ चौहानों के पीछे मुसलमान और उनके पीछे फिर हिन्दुओं का राज्य होगा ॥ कवित्त ॥ ता पच्छै सुनि राज, राज सज्जै चहुआनिय । बहुत काल अन्तरै, तपै पुहमी तुरकानिय ॥ मेच्छ अवनि तप छुटि, प्रलै हुइ है तिन बंसह । बहुरि जोर हिन्दून्, राज छुइ है इक अंसह ॥ संघारि सकल दानव कुलह, धर्म्म राज सह विस्तरै । जितै जगत तप प्रबल करि, आनि दिसा बिदिसा फिरै ॥ छं० ॥ ४२ ॥ रु० ॥ २९ ॥ फिर मेवालपति सं० १६७१ में दिल्ली जीत लेंगे* ॥ कवित्त ॥ नव सत्तै वर अंत, बहुरि ढिल्ली पति होई । पग्ग पोद घुरसान, पहुमि चक्कवै सु जोई ॥ २८ पाठान्तर—चहुआंन । बेघो । सूझै । तोअंर मग । मैं । वरजयौ । मेटै । होय । सिरजया ॥ २९ पाठान्तर—पछै । चहुआंनिय । चहुआंनीय । तुरकानीय । मेछ । मेछि । हूै हैं । हिन्दून् । हूँ । दानव । आनं । दिशा । फिर ॥

  • यह ३० और ३१ दोनों रूपक पुरानी पुस्तक सं० १६४७ की लिखी में वास्तव में तो नहीं हैं । परंतु उसके पत्रे के किनारे पर किसी अन्य ने पीछे से इन दोनों को लिख दिया है । और उस के पीछे की नवीन पुस्तकों में इन दोनों के पाठ हैं । संवत् १८३८ की में तो “मेवातपति”