भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 276

तीसरा समय ११] पृथ्वोराजरासो । २६५ मदि मेवात महीप, दीप दीपनि दल मंडै । क्किक्क रहें पय आप, इक्क पल पिंड निपंडै ॥ मंडै सु पहुमि प्रथिराज जिम, सत्त वात जोनिक जपिय । मानी सु सत्ति करि सबनि हूर, व्यास वचन व्यासच्च थपिय ॥ छं० ॥ ४३ ॥ रू० ॥ ३० ॥ दूहा ॥ सोरै सै सत्थोत्तरै, विक्रम साक बदंति । ढिल्ली धर मेवातपति, लैंहि पग्ग बल जीत ॥ छं० ॥ ४४ ॥ रू० ॥ ३१ ॥ व्यास का कहा हुआ भविष्य नहीं टरेगा ॥ कवित्त ॥ तिद्धि जथ वत्त प्रमान, सुनहि दिढ तुच्छ सुचंतं । वर म्लेच्छनि सत घटइ, धर्म्म पारस रस रतंतं ॥ हुइ नव सत्त प्रमान, ध्रुअ टरइ रवि टरइ । टरै न व्यास बचन्न, मान जस तें अजु टरई ॥ ए सब अजान सुता जु धी; परी इक्क मक्की मुची । परि पै प्रसन्न परतीत करि, तब काढत ग्राबह जुची ॥ छं०॥४५॥रु०॥३२॥ माता का दान और होम करना ॥ भुजिङ्गि ॥ सुनि श्रोतान भए चहुआनं, कही मान मति तत्त सुजानं । बहुरि पुच्छि दुजराजन आनं, कियौ होम दै दान प्रमानं ॥ छं० ४६॥ रु०३३॥ पाठ है और सं० १६४७ की प्रति में "मेवारपति" पाठ है । वैसे ही पहिली में १५७७ और दूसरी के में १०७७ पाठ हैं । निदान ये दोनों तो स्पष्टरूप से क्षेपक हैं । तथा हमारे पाठकों के ध्यान में रहे कि उदयपुर वाले स्वर्गवासी कविराज श्यामलदासजी ने जो इस महाकाव्य का आद्योपान्त जाली बनना संवत् १६४० से लेकर १६७० तक के भीतर माना है उसका आधार इन क्षेपक रूपकों में से रूपक ३१ पर रक्खा है । उसके जाली बनने के समय के विषय में हमने आदि पर्व की "उपसंहारणी टिप्पणी" पृ० १७५-१७८ तक वाक्य ३ और "पृथ्वीराजरासो की प्रथम संरक्षा" के पृष्ठ ३४ से ३७ तक वाक्य १७ में सविस्तर कथन किया है अतएव यहां अधिक नहीं कहते हैं ॥ ३० पाठात्तर-सत्तै । ढिली । पग । पोढि । चकवि । मेबाद । ढिक आहू रहि पाइ । सति । जपिय । थपीय ॥ ३१ पाठान्तर-सोरैं । सतरिसे । सित्योतरि । विक्रम। शाक । ढिल्ली । मेवारपति । लइ । पग ॥ ३२ पाठान्तर-अथ । बत । प्रमांन । तुक्क । म्लेकनि । होय । सत । प्रमान । मांन अजांन हक । मकी । घरी इक मकी मही । पस्र्यै । प्रसन ॥ ३३ पाठात्तर-छंद वाघा । चहुआनं । सुजानं । पुंछि । दुजराजनि ॥