भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 470 में से

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पृष्ठ 280

[तीसरा समय १५] पृथ्वीराजरासो । २६६

उपसंहारणी टिप्पण ।

जो कुछ हमने प्रथम और द्वितीय समय की टिप्पणी और उपसंहारणी टिप्पण में कहा है वह हमारे पाठकों के ध्यान में होगा और जो अब निवेदन किया जाता है वह भी उसी के साथ सदैव स्मरण में रहेगा। क्योंकि वह सब इस महाकाव्य के विषयक अनेक वाद विवादों के विचार और निर्णय करने के समय बहुत ही उपयोगी होगा॥ अब इस तीसरे समय-दिल्ली किल्ली कथा-का मूल लेख हमारे पाठकों की सेवा में उपस्थित है। और जो कुछ उन्होंने अब तक इस महाकाव्य के नाम से अनेक दंत कथा और वृत्तान्त पुस्तकादि में पढ़े और सुने हैं वे भी उन्हें ज्ञात हैं। अत एव अब यह एक बहुत ही अच्छा अवसर है कि हम उन दोनों का मिलान कर के देखें कि क्या आज कल के ग्रन्थकर्त्ताओं ने भी अपने लिखे वृत्तान्त ठीक ठीक इस महाकाव्य के वृत्तान्त के अनुकूल ही लिखे हैं, अथवा उनको बदल कर उनमें कुछ और अपनी मनमानी घडन्त भी करी है? यदि उनमें परिवर्तन किया गया है तो क्या उनका ऐसा करना ठीक है? मूल में मिला हुआ अगला क्षेपकांश तो अब निश्चित होना कैसा कठिन हो रहा है, तिस पर भी क्या आधुनिक ग्रन्थकर्त्ताओं का भूल से विरुद्ध कथन करना मानो नवीन क्षेपक मिलाना नहीं हो सकता है? आश्चर्य यह है कि आज कल के ग्रन्थकर्त्ता प्रतिज्ञा तो पृथ्वीराजरासो वा कवि चंद के कथनानुसार अपने कथन करने की करते हैं और जब उनकी ऐसे मूल से मिलान कर के परीक्षा की जाती है तब उनके वृत्तों में रात्रि दिन का सा अन्तर दीख पड़ता है! इसके केवल दो तीन ही उदाहरण हम यहां पर दिखाते हैं, अन्यो का विचार हमारे पाठक स्वयं कर लेंगे- (क) हिन्दी रीडर नंबर ५ अर्थात् हिन्दी शिक्षावली भाग पंचम नामक पुस्तक जो पाठ- शालाओं में पढ़ाई जाती है और जिससे बालपन से ही हमारे बालकों के हृदय पर संस्कार होता है उसमें कवि चंद के नाम से यह कहा हुआ है- “चंद कवि लिखता है कि तोमर वंश के १६ वें राजा अनंगपाल ने पृथिवीराज के जन्म के उत्सव के लिये व्यास नामक एक ब्राह्मण से मुहूर्त्त पूछा। ब्राह्मण ने कुछ सोच कर उत्तर दिया कि यही शुभ समय है, इस कीली को गाड़िये और यह शेषनाग के सिर में जा लगेगी और फिर तुम्हारा राज्य अचल हो जायगा। यह कह कीली को धरती में गाड़दी। परंतु राजा को विश्वास न हुआ। निदान उसने उस कीली को निकलवा डाला जो निकालने पर लोहू से भरी मिली। तब ब्राह्मण ने राजा से कहा कि तुम्हारा राज्य कीली के समान अस्थिर हो जायगा और तोमर वंश के बाद चौहान वंश के राजा राज्य करेंगे और उनके बाद मुसलमानों का राज्य होगा। राजा ने क्रुद्ध होकर उस ब्राह्मण को देश से निकाल दिया परंतु वह अजमेर में चला गया जहां कि उसका मान अधिक हुआ॥” (देखो हिन्दी शिक्षावली पंचम भाग पृष्ठ ४१)॥ (ख) तथा उसी पुस्तक में शाहजहां के समय में हुए भट्टराव कवि के लिखे इस वृत्तान्त को भी पढ़िये-