भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 470 में से

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पृष्ठ 282

। तीसरा समय १०] पृथ्वीराजरासो । २७१ को आये हुए भ्रमरों का गुंजार शब्द ऐसा प्रतीत होता था कि मानो कई बन्दीजन मधुर वाणी में महाराज का यश गाते हों। रेशमी डोरियों से बन्धे हुए कई कुत्ते अपने रक्तकों को ताने लिये जाते थे मानो सूअर साभर कुरंग आदि पशुओं का गंध पाकर उनके रुधिर से अपनी पिपासा बुझाने को आतुर हो रहे हों। पायदलों के ठट्ठ ने चारों ओर घिरर कर वन को घेर लिया और भेरी नफीरी आदि कई वाजिन्न बजा कर पशुओं को डराने और उनका स्थान छुड़ाने लगे। राजा और उनके साथी सामंतों ने सेल संभाले सूअरों के पीछे घोड़े छोड़े और बात की बात में कई बड़े बड़े वराहों को भूमि पर गिरा दिया। वन में चारों ओर धूम मच रही थी बिचारे पशु प्राण भय से इधर उधर भागते फिरते थे कि कंज कली को प्रफुल्लित करने वाले सूर्य्यदेव ने सिर पर आकर मानो इस हिंसा से शिकारियों को निवारण करने के लिये क्रोध दृष्टि धारण की हो, प्रचंड ताप से पृथ्वी को तपा दिया सूर सामन्त व सिपाहियों ने जहां तहां वृक्षों की छाया देख कमर खोली और जलपानादि करके श्रम दूर करने को लेटे, राजा भी एक घट वृक्ष की सघन छाया में बैठा हुआ था कि अचानक उसकी दृष्टि वन में एक स्थान पर पड़ी तो क्या देखता है कि झाड़ी की ओट में एक अजा अपने दो बच्चों को लिये बैठी है उधर से एक भेड़िया आकर बच्चों पर लपका चाहता था कि दोनों को उठा कर ले जावे इतने में माता ने सचेत हो भेड़िये से युद्ध करना आरंभ किया और भेड़िये को भगा कर बच्चों को बचा लिया। यह कौतुक देख राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। उस स्थान पर कुछ चिन्ह कर दिया कि भूल न जावे जब अपनी राजधानी को लौटा तो दिन भर के परिश्रम से थका हुआ भोजनान्तर वह शयन गृह में आकर निद्रा निमग्न हुआ। प्रभात् होते ही गुरु व्यास देव के आश्रम पर जा हाथ जोड़ कर ऋषि से वह वन का चरित्र वर्णन किया। व्यास देव कुछ काल तक समाधिस्थ हो बोले कि राजन्! वह भूमि महा पवित्र और वीर है यदि वहां गढ़ बनाया जावे तो उस गढ़ का स्वामी सर्व भूमंडल के अधिपतियों का सर्दार होवे। राजा ने निवेदन किया कि महाराज मैं वहां एक नग्र बसा कर गढ़ बनाऊंगा व्यास देव बोले कि आज तिथि, नक्षत्र वार योगादि सर्व शुभ हैं अत एव एक लोहे की कीली मंगवाओ कि वहां गाड़ दी जावे आज्ञानुसार कीली मंगवाई गई व्यास राजा सहित उसी स्थान पर गये और मंत्र पढ़ कर कीली वहां गाड़ दी जहां बकरी ने वृक को भगाया था। फिर राजा से कहा कि यहाँ गढ़ की नींव दिलवाना इस कीली को निकालने का साहम मत करना यह कीली शेषनाग के सिर में जाकर बैठ गई है सो जब तक यह अचल है तुम्हारा राज्य भी अचल रहेगा व्यास के मुख यह सुन कर कि "यह किल्ली शेष के सिर में जा बैठी है" राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ और कहने लगा कि महाराज! इतनी सी किल्ली शेष के सिर तक कैसे पहुंच सक्ती है? एक दिन कुतूहल बस राजा ने अपनी शंका निवारण करने को बिना बिचारे उस कीली को निकलवा ली कील के निकलते ही भीतर से रुधिर की धारा छूटी और कील का मुख भी रुधिर से भींगा हुआ देखा। राजा को बड़ा पश्चाताप हुआ कि मैंने केवल अपने संशय युक्त चित्त का संताप करने के निमित्त उस महर्षि की आज्ञा उल्लंघन की और अपने को महा हानि पहुंचाई फिर उस स्थान पर एक नग्र बसाया क्योंकि उस किल्ली को राजा ने ढीली कर दी थी अत एव उस नग्र का नाम भी 'ढिल्ली ही रहा जो वर्त्तमान काल में दिल्ली करके प्रसिद्ध है राजा की आज्ञां से वहां बड़े २ महल चौहट्टे और विशाल भवन बनाये गये और फिर वहीं राजधानी स्थापन हुई" ॥ ३